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Thursday, 31 January 2019

हमसफर एवरेस्ट ‘नीरज मुसाफिर’ का एक बढ़िया मुसाफिर खाना है जो बस चलता रहता है

घुमक्कड़ स्वभाव जिंदगी में नयी-नयी चीजें, नये अनुभव, नये रास्ते दिखाता है। जब लगे कि जिंदगी ठहर गई कि वो घुमक्कड़ वाला स्वभाव आ जाना चाहिये। जो कल की न सोचे, बस चल दे। मुझे लगता है नई-नई जगह जाने से आप तरोताजा हो जाते हैं, कुछ अच्छा और बेहतर करने के लिये। उन्हीं घुमक्कड़ स्वभाव के लिये पहाड़ सबसे बढ़िया जगह होती है। वो गगन छूती पहाड़ियां, वो कलकल करती नदियां और हिचकोले लेते रास्ते जैसे हमारी जिंदगी लेती है। इस सफर में कभी अच्छा लगता है, कभी बुरा लगता है। लगता है बहुत हो गया, अब लौट लेते हैं कि फिर मन कहता है ‘अभी नही तो कभी नहीं’। ऐसी ही दो सैलानियों की यात्रा की कहानी है ‘हमसफर एवरेस्ट’।

एवरेस्ट बेस कैंप तक का यात्रा वृतांत है इस किताब में।


हमसफर एवरेस्ट को लिखा है नीरज मुसाफिर ने। नाम ही कह रहा है कि ये घूमते-फिरते रहते हैं। नीरज मेरठ के रहने वाले हैं। मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया है और दिल्ली में नौकरी कर रहे हैं। उसी नौकरी में से समय निकालकर भारत के हिस्सों में घूमते-फिरते रहते हैं। साल 2008 से अपनी तमाम यात्राओं के बारे में अपने ब्लाॅग में लिखते आ रहे हैं। नीरज ब्लाॅग और फेसबुक पर खासे एक्टिव रहते हैं। उन्होंने इस किताब के अलावा ‘सुनो लद्दाख’ और ‘पैडल-पैडल भी लिख चुके हैं।


हमसफर एवरेस्ट 


हमसफर एवरेस्ट एक ऐसे मुसाफिर का यात्रा वृतांत है। जो दिल्ली से मोटर साइकिल से शुरू होता है और नेपाल होते हुये एवरेस्ट बेसकैंप तक पहुंचता है। इस किताब में बारीकी से हर दिन और मिनट की चर्चा है। मतलब कि कहां-कहां रूके, कहां गये, क्या खाया? सबसे बड़ी बात हर जगह की कीमत दी हुई थी। लेखक कोई बड़े साहित्यक नहीं हैं न ही किताब में बनने की कोशिश करते हैं। वे अपनी यात्रा को सीधे-सीधे समझाते हैं और बताते हैं। उनके दिमाग में उस समय क्या चल रहा था। उसको भी किताब में उकेर देते हैं।

अगर किसी को एवरेस्ट या बेस कैंप तक जाना है तो ये किताब वाकई बहुत ही उपयोगी है। लेकिन सुंदरता और लेखन के हिसाब से पढ़ेंगे तो बोर हो उठेंगे। शुरूआत में आप बोर भी हो सकते हैं क्योंकि उसमें पहाड़ नहीं मिलता, नेपाल नहीं मिलता। लेखक गाड़ियों से हमें उत्तर प्रदेश ले जाते हैं यानि कि किताब की शुरूआत थोड़ी लंबी है लेकिन नेपाल में आने के बाद किताब आपको बांधने लगती है। इसमें जानकारी तो होती ही है और लेखनी भी ऐसी होती है जो आपको अच्छी लगती है।

किताब में नेपाल-भारत की दोस्ती का जिक्र है। जिक्र है कि एवरेस्ट पर जाना भी इतना भी आसान नहीं है। सब सोचते हैं कि पहाड़ पर चढ़ना आसान है बस हमें समय नहीं मिलता है लेकिन जब आप पढ़ते हैं कि ठंड की वजह से हाथ-पैर भी कांटने पड़ते है तब पता चलता है कि ये बच्चों का खेल नहीं है। किताब में ऐसे उदाहरण मिल जायेंगे कि चढ़ाई के दौरान क्या-क्या परेशानी आती है? इन परेशानियों का सामना करने वाले ही उस चढ़ाई तक पहुंच जाते हैं और जो डर जाते हैं वे बीच में ही लौट आते हैं।

किताब में छब्बीस दिनों की कहानी है जिसमें बीस दिनों में एवरेस्ट तक चढ़ने की बातें हैं। उसके बीच में सुंदर दृश्य और कठिनाई भी हैं जो दिमाग में घूमते रहते हैं। लेखक अपनी यात्रा को आराम से पूरा करता है और चलता जाता है। हर चीज का प्लान बनाता है कि आज यहां पहुंचना है और अगर वो पूरा नहीं होता है तो अगले दिन फिर प्लान होता है। किताब में बताया जाता है नेपाल के पहाड़ तो सुंदर हैं लेकिल लोग भारत के ही अच्छे है। भारत सस्ता और अच्छा दोनों हैं।

एवरेस्ट का रास्ता होने के कारण नेपाल महंगा है। लेकिन एक बात अच्छी थी कि होटल फ्री में मिल जाते थे लेकिन शर्त रहती थी कि खाना होटल में ही खाना पड़ेगा। अच्छा तरीका है बिजनेस चलाने का।

एवरेस्ट तक जाने का बढ़िया जरिया है ये किताब।

अदना-सा अंश


27 मई 2016
सुबह साढ़े छः बजे क आसपास आंख खुली। बाहर निकले तो नजारा मंत्रमुग्ध कर देने वाला था। हो भी क्यों न? हम 4800 मीटर पर थे और आसमानों में बादलों का नाम तक नहीं था। दो चोटियों ने सारी महफिल अपने नाम कर रखी थी। एक तो यही बराबर में थी चोला-चे। इसे चोलात्से भी लिख देते हैं, लेकिन कहते चोला-चे ही हैं। 6300 मीटर पर यह चोटी बर्फ से लकदक थी। यह हमसे केवल इतनी दूर थी कि लगता कि हम तबियत से पत्थर फेकेंगे तो उससे पार परली पार जा गिरेगा।

किताब की खूबी


किताब जानकारी से लदालद भरी पड़ी है। किसी को अगर नेपाल होते ही एवरेस्ट या एवरेस्ट बेस कैंप जाना है तो नक्शे से ज्यादा यह किताब महत्ववपूर्ण है। किताब पुरानी नहीं है तो आराम से पहुंचा देगी। आपको उसमें बांधे रखती है। अगर कोई घुमक्कड़ स्वभाव का है, पहाड़ों में जाना अच्छा लगता है तो उसे यह किताब बढ़िया लग सकती है। कुल मिलाकर मुसाफिरों के लिये एक मुसाफिर खाना है।

किताब की कमी


जानकारी के हिसाब से अच्छा कहा जा सकता है लेकिन कुछ कमी भी हैं जो मुझे लगी। शुरूआत कुछ ज्यादा लंबी हो गई, जिसमें लग रहा था कि ये सब है ही क्यों? पाठक के हिसाब से थोड़ा साहित्यक होना चाहिये था। पहाड़ों और दृश्यों का वर्णन अच्छे से किया जाता है तो मजा ही आ जाता। यह किताब उनको अच्छी नहीं लगेगी जा घूमते नहीं हैं या जिनको घूमना पसंद ही नहीं है।

हमसफर एवरेस्ट कुल मिलाकर एक मुसाफिर का मुसाफिर खाना है जिसने कुछ दिनों में बहुत कुछ पाया और उसे पाने में क्या-क्या कठिनाईयां आई वो सब उसने अपने मुसाफिर खाने में रखी हुई है। मैं अक्सर यही सोचता हूं कि कहीं जाने के लिये सच में प्लान बनाना चाहिये या फिर कहीं जाने के लिये साथी होना जरूरी है। मैं हमेशा से नहीं ही कहता था, अब भी कहता हूं लेकिन अगर साथी हो तो क्या खराबी है? हमसफर मुसाफिर में भी लेखक का एक साथी है जो उसके साथ हमेशा चलते ही रहता है बिल्कुल हमसफर मुसाफिर की तरह।

लद्दाख यात्रा की अच्छी-खासी जानकारी देती है सुनो लद्दाख किताब

बर्फ से ढके पहाड़ और आसमान की तरह ही सफेद जमीन और उसी मौसम में रोड ट्रिप करते लोग। हम सब लद्दाख के बारे में ऐसा ही सुनते आये हैं। कुछ साथी तो कहते भी हैं कि लद्दाख पर मोटरसाईकिल चलाना मेरा सपना है। लेकिन उन सपनों को तोड़ने का काम करती है नीरज मुसाफिर की किताब ‘सुनो लद्दाख’।


इससे पहले भी मैं नीरज मुसाफिर की ‘हमसफर एवरेस्ट’ पढ़ चुका हूं। दोनों की तुलना अगर मैं करूं तो पढ़ने के लिहाज से ‘सुनो लद्दाख’ अच्छी है जबकि मुश्किले वाले किस्से पढ़ने हैं तो हमसफर एवरेस्ट पढ़नी चाहिये।


नीरज मुसाफिर पेशे से इंजीनियर हैं और दिल्ली में रहते हैं। वे साल भर घूमते-रहते हैं और इसको जानने के लिये उनका फेसबुक अकाउंट देखना चाहिये। जिसमें वे हर रोज कहीं न कहीं घूम ही रहे होते हैं। नीरज किताब के अलावा अपने ब्लाॅग के जरिये लोगों से जुड़े रहते हैं। नीरज यात्रा करते हैं और उसको कलम से कभी ब्लाॅग पर तो कभी किताब में छानते हैं।

सुनो लद्दाख के बारे में 


सुनो लद्दाख किताब में नीरज मुसाफिर के दो यात्रा वृतांत हैं और दोनों ही लद्दाख के हैं। एक सर्दियों में किया जो ज्यादा मुश्किलों से भरा रहा और दूसरा अगस्त के महीने में। नीरज मुसाफिर ने दो ट्रैक किये एक चादर ट्रैक और दूसरा जांस्कर ट्रैक।

लद्दाख के बारे में अपने नजरिये से बताने की कोशिश की है यानि कि जिंदगी चल रही थी और मैं देख रहा था। जो देखा वो सब किताब में। किताब में लेह की कपकपाती सर्दी है और रोड पर फिसलन वाली बर्फ है जो लेखक को चलने से डराती है। लेखक दिल्ली से लेह हवाईयात्रा करके आता है और फिर मुसाफिरों की तरह निकल पड़ता है कभी बाजार में, कभी गांव में और चिलिंग गांव में।  किताब का पहला पड़ाव मुश्किलों से भरा दिखाई देता है जब वो चादर ट्रैक करता है। वो उस गांव के घर में ही पड़ा रहता है क्योंकि उस माइनस वाली बर्फ को झेलना बहुत मुश्किल होता है।

किताब में लद्दख के लोगों के बारे में पता चलता है, वहां की संस्कृति, रहन-सहन और उनके व्यवसाय के बारे में। लेखक थोड़ा सा चादर ट्रैक करता है और वापस लौट आता है।

जब लेखक वापस लौटता है तो मेरे मन में ख्याल आता है कि अब आगे क्या होगा? लेखक फिर से वापस आयेगा या फिर पूरी किताब में अब लेह की कहानी होगी। तभी किताब का दूसरा भाग शुरू होता है, पदुम-दारचा ट्रैक।
लेखक एक बार फिर से दिल्ली से लद्दाख के सफर पर आता है लेकिन इस बार अपने साथियों के साथ इसमें सिर्फ चढ़ाई ही चढ़ाई होती है और खर्चा भी बहुत होता है। इस भाग में बस चलते रहना था। जिसका जिक्र नीरज बार-बार करते हैं। लद्दाख महंगी जगह है ये सुनो लद्दाख में जाना जा सकता है। किस-किस रास्ते से लद्दाख जाया जा सकता है? इन रास्तों पर कौन-कौन से ट्रैक मिलते हैं इनकी जानकारी भी इस किताब में है।

सुनो लद्दाख में नीरज मुसाफिर ने एक अच्छा काम किया है कि उन्होंने किताब के अंत में लद्दाख जाने के लिये कुछ प्वाइंट दिये हैं जिनको पढ़ लिया जाये तो यात्रा आसान हो जायेगी। कुल मिलाकर यह किताब नीरज मुसाफिर का एक और यात्रा वृतांत है जो साहित्यक से ज्यादा देखे हुये लिखने जैसा है।

किताब से

सवा सात बजे एक गांव में पहुंचे, नाम था अबरान। भूख लग रही थी, एक जगह गाड़ी रोक दी गई। हमें पचास मीटर आगे एक दुकान दिखी तो पैदल ही उस दुकान की तरफ बढ़ चले। चार कप चाय बनवा ली। तीन हम और एक ड्राइवर। चाय बन गई तो हमने ड्राइवर को आवाज दी। तभी दुकान वाले ने कहा कि वो नहीं आयेगा क्योंकि वो कारगिल का रहने वाला है। ये लोग हम बौद्धों के यहां कुछ नहीं खाते, खायेंगे तो सिर्फ कारगिल वालों की दुकान पर। जहां उसने गाड़ी रोकी थी, वहां एक कारगिल वालों की दुकान है। उसने वहां चाय पी है, लेकिन हमें वो बिल्कुल दुकान नहीं लग रही थी। अगर लगती तो हम पचास मीटर आगे नहीं आये होते। हमने पूछा कि इस तरह का खान-पान का विचार आप लोग भी करते हो क्या? बोला कि नहीं, हम ऐसा नहीं करते। कारगिल जाते है तो इन्हीं लोगों के यहां खाना खाते हैं।

किताब की खूबी


किताब बिल्कुल सरल तरीके में लिखी गई है। किताब में साहित्यक भाषा न होने के बावजूद किताब अच्छी लगती है। जो भी होता है वे किताब में लिखते गये हैं बिल्कुल सीधी यात्रा की तरह। वो अपनी यात्रा को अपने अंदाज में बताते जाते हैं और यही कारण है कि किताब अच्छी है। इसके अलावा किताब जानकारियों से भरी है। सभी ने लद्दाख के बारे में सुना है लेकिन चादर, जांस्कर, चा जैसी जगहों के नाम इस किताब से मिलते हैं।

यह किताब उनको बड़ी पसंद आयेगी जो घुमक्कड़ स्वभाव के हैं। उनको भी मजा आयेगा जो सोचते हैं कि मैं लद्दाख घूमने जाऊंगा। ऐसे लोगों को इस किताब को अपने पास संभाल कर रखना चाहिये।

किताब की कमी


किताब अच्छी है इसमें कोई शक नहीं है लेकिन कमी न हो ऐसा भी नहीं है। किताब में ऐतहासिक बातें बड़ी हैं जो मुझे लगता है शायद इतिहास बताने की जरूरत नहीं थी। क्योंकि यात्रा वृतांत में यात्रा होनी चाहिये और कुछ नहीं। इसके अलावा सुंदर दृश्यों के वर्णन में रोचकता नहीं दिखती। सादा रास्ता और पहाड़ी रास्ता एक ही मनोदशा में लिखा हुआ लगता है।

सुनो लद्दाख नीरज मुसाफिर की किताबों का एक इंप्रूवमेंट है जो पिछली किताब से बेहतर है। इस किताब में पैदल यात्रा से लेकर गाड़ी यात्रा का अनुभव है। नीरज मुसाफिर की लेखनी में भी मुसाफिरपना है यानि कि बेफ्रिक, बेफ्रिक चले थे तो बेफिक्र ही लिख दिया है।

किताब- सुनो लद्दाख,लेखक- नीरज मुसाफिरप्रकाशक- रेडग्रैब बुक्स।