Friday, 17 April 2020

जल थल मल: कुछ अहम मुद्दों पर सोचने को मजबूर करती है ये किताब

इस समय पूरी दुनिया में स्वच्छता पर बहुत ध्यान दिया जा रहा है। भारत में तो इस पर एक अभियान चल रहा है। जिसके तहत पूरे देश में शौचालय बनाए जा रहे हैं। शौचालय में लोग जा रहे हैं या नहीं जा रहे हैं वो अलग बात है। मगर सवाल ये है कि क्या शौचालय से स्वच्छता आएगी? ये शौचालय करते क्या हैं? हमारे मल को जल और मिट्टी तक ले जाते हैं। इससे तो हमारी नदियां, हमारा भूजल और हमारी जमीन को नुकसान हो रहा है। इसी मल का जल और थल के संबंधों, समस्याओं और इन्हीं के इर्द-गिर्द सवालों पर सोचने को मजबूर करती है सोपान जोशी की किताब ‘जल थल मल’।


जल थल मल में सिर्फ शौचालय की बात नहीं की गई है। इसमें विज्ञान, पर्यावरण, नदियां, भोजन के बारे में बहुत गहन तरीके से बताया गया है। सोपान जोशी उन अनदेखे पहलुओं के बारे में बताते हैं। जिनके बारे में हमें या तो पता नहीं है या फिर हम उस ओर ज्यादा ध्यान नहीं देते। इस किताब को सिर्फ पढ़ना ही नहीं चाहिए बल्कि इसके हर पहलुओं पर बात और चर्चाएं भी करनी चाहिए।

लेखक के बारे में

लेखक।

जल थल मल को लिखा है सोपान जोशी ने। सोपान जोशी का जन्म 1973 में मध्य प्रदेश के इंदौर में हुआ। दिल्ली में स्कूली शिक्षा पूरी की और 1996 में दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य से गे्रजुएशन किया। सोपान जोशी पेशे से पत्रकार हैं। पहले वो अखबारों और पत्रिकाओं में काम किया करते थे। खेती-किसानी, विज्ञान, पर्यावरण, जल प्रबंधन, खेल पर रिपोर्टिंग की है। अब दिल्ली में रहकर ही स्वतंत्र लेखन करते हैं। इस किताब के अलावा उनकी दो और किताबें हैं, एक था मोहन और बापू की पाती।


किताब के बारे में


सोपान जोशी ने अपनी इस किताब को 10 अध्यायों में बांटा है। हर अध्याय में अलग-अलग विषय पर बात होती है। किताब के पहले पन्ने पर भगवान बराह का सुअर रूपी चित्र बना हुआ है। आगे पढ़ते हुए इस बारे में समझमें आ जाता है। किताब का पहला अध्याय है ‘जल थल मल’। शुरू में लेखक इस सृष्टि के बनने और उसमें रहने वाले जीवों के बारे में बताते हैं। वे इस संसार के नियमों के बारे में बात करते हैं। प्रलय कैसे हुआ, मनुष्य की प्रजाति कैसे आई? इस बारे में पता चलता है। शुरू में पढ़ते हुए लगता है कि मैं कोई विज्ञान की किताब पढ़ रहा हूं। लेकिन जल्दी ही लेखक मूल विषय पर चर्चा करते हैं, मल। लेखक लिखते हैं, ’हमारी आबादी चौगुनी हुई है तो हमारा मल-मूत्र भी चौगुना बढ़ा है लेकिन उसके ठिकाने चौगुने नहीं हुए हैं।’

इस बारे में किताब में कई आंकड़े दिए जाते हैं जो बेहद भयावह हैं। जिन आधुनिक शौचालय का हम इस्तेमाल करते हैं वो जल प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण है। इस मल का विर्सजन कैसे किया जाए? कहां किया जाए? इस बारे में उदाहरण सहित बताती है ये किताब। इसमें लंदन की टैम्स नदी का उदाहरण है जो 1850 में नाला बन गई थी। इसके अलावा कोलकाता के भेरिया के बारे में बताते हैं जो शहर के गंदे पानी से मछली पालन करते हैं। सोपान जोशी बताते हैं कि सबसे ज्यादा मल कहीं पैदा होता है तो वो है, ट्रेन। मल और रेल का पूरा गणित समझाती है ये किताब। तब लगता है कि इस बारे में हमने तो कभी सोचा ही नहीं। सरकार शौचालय के लिए योजनाएं सालों से बनवा रही है। हर बार स्वच्छता के नाम पर बस उनके नाम बदल दिए जाते हैं। न तो इन सालों में शौचालय की पद्धति बदली और न ही उनका निकासी तंत्र।


किताब में बहुत सारे चित्र बने हुए हैं। जिनको उकेरा है सोमेश कुमार ने। इस वजह से किताब पढ़ते हुए उन चित्रों को घटनाओं और लेखक की बातों से जुड़ पाते हैं। ये चित्र किताब को और अधिक प्रभावी बनाते हैं। आगे बढ़ने पर किताब आधुनिकता वाले मल के एक बेहद चिंताजनक पहलू को बताती है। ये पहलू है उस प्रथा का जिसमें एक जाति विशेष के लोग मैला ढ़ोते हैं। दूसरे देशों में इसके लिए प्रशिक्षण और उपकरण दिए जाते हैं लेकिन हमारे देश में ऐसा कुछ नहीं है। किताब में ही ऐसी कई घटनाओं का जिक्र है जिसमें सीवर सफाई करते हुए लोगों की मौत हो गई। 1993 में इस प्रथा को बंद कर दिया गया था। किताब में एक जगह लेखक लिखते हैं कि देश भर में करीब सात लाख लोग हाथ से मैला ढो रहे हैं। लेखक ऐसा काम करने वाली जातियों और उनके इतिहास के बारे में भी बताते हैं।

शुचिता का विचार


लेखक किताब में बार-बार शुचिता का जिक्र करते हैं। शुचिता का अर्थ है पवित्र भाव। आगे किताब में नदी से हमारी दूरी के बारे में जिक्र है। हमने कैसे नदियों को नाला बना दिया और फिर उसे साफ करने के लिए सीवर तंत्र लगा दिए। इन सबकी खामियां और आलोचना करती है ये किताब। मैले पानी को कैसे साफ किया जाए? उसकी कुछ सफल पद्धतियों के बारे में भी बताती है ये किताब। हमारे मल और शौचालय ने कितनी की नदियों को पाट दिया है। इसमें इसमें दिल्ली की यमुना की सहायक नदियां, मुंबई की मिट्ठी जैसी तमाम नदियां हैं। पहले ये देश तालाबों और नदियों का देश कहलाया जाता था। लेखक कहता है कि आज पानी को सहेजने की प्रणाली ‘नाले’ बन चुकी हैं।


किताब में लिखा है कि पहले मल को सिर्फ नदियों में नहीं बहाया जाता था। मल को खाद के रूप में उपयोग किया जाता था। इतिहास के कई उदाहरण भी इसमें बताए गए हैं जिसमें लोग मल को खेती के लिए खरीदते हैं। गांव के लोग पहले इसलिए खेतों मल विर्सजन करने जाते थे। सोपान जोशी बताते है, मल को पहले सोने की उपमा दी जाती थी। हरित क्रांति आई तो ये मल खेतों की जगह नदियों में जाने लगा। लद्दाख में एक पद्धति है ‘छागरा’। जिससे मल खेतों के लिए आज भी इस्तेमाल किया जाता है। शौचालय कैसे होेने चाहिए? उस बारे में भी विस्तार से बताती है ये किताब। इसमें इतिहास के कई घटनाएं, विषयों के बारे में गहन चर्चा और उदाहरण से इसमें गहनता आती है।

क्या है खास?


ये किताब कई अहम मुद्दों पर लिखी गई है। जल प्रदूषण, मल तंत्र और थल के बारे में। इन तीन मुददों को लेकर किताब कई विषयों को समेटती है जिसमें नदियां, उद्योग, सीवर, खाद्य तंत्र, शौचालय और फसल आदि चीजें हैं। ये किताब इसलिए खास है क्योंकि एक जगह पर इतनी सारी बातों पर गहन अध्ययन मिलना मुश्किल है। इसमें एक और खास चीज है, संदर्भ। लेखक ने संदर्भ के लिए 20 पेज दिए हैं। हर अध्याय के लिए संदर्भ कहां से और कैसे लिया? इसको विस्तार से बताया है। इस प्रकार से संदर्भ बहुत कम किताबों में मिलते हैं। ऐसे ही संदर्भ मुझे अनुपम मिश्र की ‘आज भी खरे हैं तालाब’ में मिले थे।

किताब पढ़ने पर पता चलता है कि इसमें कितना रिसर्च की गई, लेखक ने कितनी स्टडी की है। जैसा कि मैंने शुरू में ही कहा कि आप ज्यों-ज्यों इसको पढ़ेंगे आप उसके बारे में सोचना शुरू कर देंगे। किताब में भाषा बिल्कुल सहज और सरल है। इसे पढ़ने में किसी भी प्रकार की समस्या नहीं होगी। इस किताब को देश के हर नागरिक को पढ़ना चाहिए। अगर हम इन विषयों के बारे में अच्छे से जान लेेंगे। उसके बाद शायद हम वो गलतियां न करें जो आज करते हैं।


जल थल मल की कीमत समझाती है ये किताब। ये सब कुछ आता है शुचिता के भाव से। लेखक कहता है कि शुचिता की परख हमारे सामाजिक संबंधों की पड़ताल है। शुचिता का काम आधुनिकता और परंपरा की थकी हुई बहस नहीं है। इसमें आधुनिकता भी होनी चाहिए और परंपरा भी। ये किताब पढ़ी जानी चाहिए क्योंकि ये शुचिता के पटल को खोलती है। इसको पढ़ा जाना चाहिए ताकि हम विवश को उस गंदगी के बारे में सोचने को। जो हमें जल थल मल के मोल को नहीं समझने दे रही है।

किताब- जल थल मल
लेखक- सोपान जोशी
कीमत- 278 रुपए
प्रकाशन- राजकमल प्रकाशन
कुल पृष्ठ- 208।

Thursday, 26 March 2020

सौंदर्य की नदी नर्मदाः अमृतलाल वेगड़ ने इस किताब से करा दी नर्मदा की यात्रा

यात्रा करना हर किसी को अच्छा लगता है लेकिन उसे ठीक वैसे ही शब्दों में बयां करना थोड़ा कठिन होता है। कई यात्रा वृतांत कलम की जादू की वजह से अच्छे लगते हैं तो कुछ अनुभव और किस्सों से। ऐसे ही कई मनोरंजक और छोटे-छोटे किस्से, कहानियों से अमृतलाल वेगड़ की किताब मुझे पसंद आई। कहते हैं कि अच्छी किताब वो है जो एक ही बार में पढ़ ली गई हो। वो अच्छी किताब हो सकती है लेकिन कुछ किताबों को पढ़ते हुए लगता है कि इसे आराम-आराम से पढ़ा जाए। ‘सौंदर्य की नदी नर्मदा’ ऐसी ही एक किताब है।


‘सौंदर्य की नदी नर्मदा’, अमृतलाल वेगड़ की नर्मदा यात्रा का अनुभव है। नर्मदा, भारत की पांचवी सबसे बड़ी नदी है। इसे मध्य प्रदेश की जीवन रेखा भी कहा जाता है। नर्मदा अमरकंटक से अरब सागर तक 1,312 किमी. की यात्रा करती है। अमृतलाल वेगड़ ने भी नर्मदा के किनारे-किनारे पैदल यात्रा की। उन्होंने ये यात्रा एक ही बार में पूरी नहीं की। उन्होंने नर्मदा यात्रा 1977 से 1987 के बीच में की। उस यात्रा को और उसके अनुभव को अमृतलाल वेगड़ ने अपनी किताब में समेटा है।

लेखक के बारे में

लेखक अर्मतलाल वेगड़।

अमृतलाल वेगड़ अच्छे साहित्यकार और चित्रकार रहे। वे मध्य प्रदेश के जबलपुर के रहने वाले थे। उन्होंने नर्मदा संरक्षण के लिए आवाज उठाई। 47 साल की उम्र से उन्होंने नर्मदा की यात्रा शुरू की और 2009 तक करते रहे। उन्होंने नर्मदा की कई बार यात्रा की और उसके बारे में पूरी दुनिया को बताया। सौंदर्य की नदी नर्मदा के लिए उन्हें 2004 में साहित्य अकादमी पुरस्कार भी दिया गया। इस किताब के अलावा उन्होंने नर्मदा पर ही दो किताबें ‘अमृतस्य नर्मदा’ और ‘तीरे-तीरे नर्मदा’ लिखी है। 6 जुलाई 2008 को उनका देहांत हो गया।


किताब के बारे में


लेखक अपनी यात्रा शुरू करता है अपने घर जबलपुर से। लेखक शुरू में अपने जाने की वजह और साथियों के बारे में बताता है। पूरी यात्रा में हर बार लेखक के साथी बदलते रहते हैं। नर्मदा के किनारे-किनारे पैदल यात्रा करते हैं। वो नर्मदा के गांवों, आसपास के इलाके और लोगों के बारे में बताते जाते हैं। अपने अनुभवों को भी लेखक अच्छे से बताता है। पढ़ते हुए लगता है कि हम भी लेखक के साथ नर्मदा यात्रा पर निकल गए हैं। नर्मदा के बारे में लेखक बहुत कुछ बताते हैं। वो कहते हैं, गंगा श्रेष्ठ है लेकिन ज्येष्ठ नर्मदा है। नर्मदा, गंगा से पहले की है और लाखों लोगों की जीवन रेखा है।

इस किताब को पढ़ते हुए आपको नर्मदा के स्वरूप को समझ में आएगा। नर्मदा, किस जगह कैसी है, उसकी सहायक नदियों का स्वरूप क्या है? गर्मियों में नर्मदा कैसी बहती है और जब सूख जाती है तब कैसी उजाड़ लगती है। नर्मदा के बारे में सब कुछ किताब को पढ़ते हुए समझ में आता है। उस समय गांव कैसे होते थे, वहां का परिवेश और लोगों के बारे में बताते हैं। बीच-बीच लोगों से हुई बातचीत को डालकर इसे और अच्छा बनाते है। इस किताब से ही पता चलता है 80 के दशक में गांव के लोग स्टोव देखकर कितने खुश होते थे। आज तो हमारी जिंदगी से स्टोव पूरी तरह से गायब हो चुका है।

लेखक की यात्रा का पूरा रूट।

नर्मदा की यात्रा बढ़ती जाती है लेखक नई जानकारी देता रहता है। कभी झाड़ी में रहने वाले भीलों के बारे में, जो वहां आने वाले लोगों को पूरी तरह लूट लेते। शरीर से सारे कपड़े तक उतार लेते। तब लगता कि भील उस जमाने के चोर हैं लेकिन आगे जाकर उनकी भुखमरी और गरीबी को देखकर दुख होता। इसके अलावा नर्मदा अपने वाले डैम के बारे में भी बताते। जो आसपास के इलाके को डुबा देगा। अमृतलाल वेगड़ कहते हैं, ’आज जैसी नर्मदा मैं देख रहा हूं, जिस रास्ते पर मैं चल रहा हूं। कुछ सालों बाद इन पर कोई नहीं चल पाएगा। यहां दूर-दूर तक पानी होगा’। बातचीत में लेखक को गांव वाले डैम से होने वाले नुकसान के बारे में भी बताते हैं। हालांकि लेखक डैम का बनाना अच्छा मानते हैं।

लेखक एक बार में जहां तक की यात्रा करता, अगली बार वहीं से शुरू करता। ऐसे में उसने नर्मदा को अलग-अलग साल और अलग-अलग महीनों में देखा। नर्मदा कैसे बढ़ती है और कैसे बदल जाती है लेखक ने अच्छी तरह से वर्णन किया है। नर्मदा पहाड़ और मैदान दोनों से होकर गुजरती है। लेखक ने जिस कुशलता से नदी के बारे में बताते चले हैं वो वाकई बेहतरीन है। मैंने कभी नदियों के किनारे-किनारे यात्रा नहीं की लेकिन इस किताब को पढ़ने के बाद ऐसी ही किसी यात्रा पर जाने का मन करता है।

जैसे-जैसे नर्मदा मध्य प्रदेश छोड़कर गुजरात पहुंचती है तो पढ़ने में और मजा आने लगता है। नर्मदा का उद्गम है मध्य प्रदेश के अमरकंटक में और समुद्र में मिलने से पहले आखिरी पड़ाव है, गुजरात का विमलेश्वर गांव। समुद की झलक, अमरकंटक का उद्गम, ओंकरेश्वर का मन मोहने वाला नजारा, ये सब पढ़कर लगता है नर्मदा की यात्रा करनी चाहिए। नदी के बारे में अमृतलाल वेगड़ किताब में लिखते हैं, ‘नदी है- जन्मजात यात्री। जन्म लेते ही चल पड़ती है और एक बार जो चली तो एक क्षण के लिए भी नहीं रूकती।’ इसके अलावा हर चैप्टर के पीछे उनका स्केच बना है। जो उन्होंने अपनी नर्मदा यात्रा में बनाया था। उन्होंने ये यात्रा किन मुश्किलों का सामना करते हुए की? खाना कैसे खाते थे? ठहरते कहां थे? ये सब आपको इस किताब में पढ़ते हुए आनंद आएगा।

सौंदर्य की नदी नर्मदा।

किताब से कुछ


पुजारी जी से खूब बातें होती हैं। नवागाम बांध की बात चली तो कहने लगे, ‘बांध के बन जाने पर सबसे पहले डूबेगा शूलपाणेश्वर मंदिर। शूलपाण की पूरी झाड़ी डूब जाएगी।’ जाने-अनजाने में मेरे मन मे यह बात है कि इस सुंदर, एकांत स्थान में जितना हो सके, रह लो। जी भरकर देख लो। पन्द्रह वर्ष के बाद तो इसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। शायद इसलिए चार दिन से मैं यहां घूम रहा हूं।

किताब की खूबी और कमी


किताब की सबसे बड़ी खूबी तो ये यात्रा है जो लेखक ने पैदल की। उसे जिस तरह से बताया है वो भी काफी रोचक है। इसमें जो जानकारी हैं, भीलों क बारे में , बैगा स्त्रियों के बारे में, उस समय के रीति-रिवाजों के बारे में, ये सब इस किताब को और रोचक बनाते हैं। इसके अलावा नर्मदा यात्रा के लिए ये किताब एक नक्शे की तरह है हालांकि डैम बनने के बाद इसमें काफी कुछ बदलाव आ गया है। अगर आप घुमक्कड़ हैं तो आपको इसे जरूर पढ़ना चाहिए। अगर आप नहीं घूमते हैं तो इस किताब से आप नर्मदा यात्रा कर सकते हैं।

इस किताब में मुझे कमी तो नहीं लगी लेकिन भाषा पूरी तरह से साहित्यक है। शायद जिस समय ये यात्रा हुई तब ऐसे ही बोलचाल हो। ये भी हो सकता है कि पहले किताबों की भाषा साहित्यक होती थी। इसी वजह से कुछ-कुछ शब्दों का अर्थ पता ही नहीं होता है। जिसे समझने में थोड़ी मुश्किल आती है। ऐसे यात्रा वृतांत आज के समय में नहीं लिखे जाते। तब के यात्रा वृतांत की भाषा और आज के यात्रा वृतांत की भाषा में आया बदलाव इस किताब को पढ़कर समझ सकते हैं।

इस किताब को पढ़ने के बाद सच में समझ में आता है कि नर्मदा, सौंदर्य की नदी है। अमृतलाल वेगड़ ने इस किताब से हमें अपनी यात्रा के बारे में नहीं बताया। इससे हमने नर्मदा को समझा, नर्मदा के किनारे रहने वाले लोगों के जीवन के बारे में पता चला। किताब इतनी अच्छी तरह से लिखी गई है लेखक के साथ पाठक भी नर्मदा की यात्रा कर लेता है।

किताब- सौंदर्य की नदी नर्मदा,
लेखक- अर्मतलाल वेगड़,
प्रकाशन- पेंगुइन बुक्स,
कुल पेज- 176,
लागत- 199 रुपए।

Wednesday, 12 February 2020

आधार से किसका उद्धारः आधार से सुधार नहीं हुआ है नुकसान, यही बताती है ये किताब

सरकार जब कोई योजना लाती है तो उसे जनकल्याण बताकर लाती है। हो सकता है बाद में उसका कल्याण किसी और का हो। ऐसी ही एक योजना है जिसे हम सब ‘आधार’ के नाम से जानते हैं। जब इसे लाया गया तो इसके बारे में कहा गया कि इससे उन लोगों को फायदा मिलेगा, जिनके पास पहचान पत्र नहीं है। समय बीतता गया और आधार का मकसद भी। आधार बनाया तो गया तो लोगों का उद्धार करने के लिए। लेकिन इसने कई समस्याओं को खड़ा कर दिया और कई सवालों को जन्म दिया। आधार, उसकी खामियां और उससे पैदा हुई समस्याओं के बारे में विस्तार से बताती है ये किताब ‘आधार से किसका उद्धार’।



यूपीए-2 के समय यानी कि 2009 में सरकार ने भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण यानी कि यूआईडीएआई का गठन किया। इसका मुख्य उद्देश्य लोगों को एक आईडी नबंर देना था। जो नंबर आधार कार्ड के रूप में आया और वो आधार प्रोजेक्ट बन गया। इस पहचान को देने के लिए बायोमैट्रिक सत्यापन कराया गया। जिसमें आपको अपनी कुछ जानकारी देनी होती है। इसके अलावा फोटो, उंगलियों के निशान और आंखों की रेटिना के छाप देने होते हैं। इसको सरकार ने एक व्यक्ति से लोगों के बीच फैलाया, नाम- नंदन नीलेकणी। 2015 तक बिना किसी कानून के आधार लोगों तक पहुंचाया दिया गया। जब इस पर सवाल उठने लगे तो 2015 में इसे बिल बनाने की बात कही गई। लेकिन बीजेपी सरकार के पास बहुमत नहीं था इसलिए इसे मनी बिल से पास किया गया। इस पर 2018 में सुप्रीम कोर्ट का एक बड़ा फैसला आया। जिसने आधार परियोजना को वैधानिक बताया।

लेखक के बारे में

लेखिका।

आधार पर इस शानदार किताब की लेखिका हैं, रीतिका खेड़ा। रीतिका खेड़ा इस समय आई.आई.एम. अहमदाबाद में इकाॅनाॅमिक्स और पब्लिक सिस्टम ग्रुप की सहायक प्रोफेसर हैं। रीतिका ने दिल्ली स्कूल ऑफ इकाॅनाॅमिक्स से पी.एच.डी. की है और सात सालों तक आई.आई.टी. दिल्ली में अध्यापन कर चुकी है। रीतिका के शोधकार्य ने भारत की अनेक नीतियों पर बहस को जन्म दिया। रीतिका कई अखबारों, मैग्जीन और बेबसाइटों के लिए लेख लिखती रहती हैं।

किताब एक नजर में


किताब शुरू होती है अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज की प्रस्तावना से। जिसमें वो आधार के मकसद को बताते हैं। उसके स्वैच्छिक से अनिवार्य होने की कहानी को बताते हैं। आधार की समस्याओं और इस किताब के बारे में कुछ अच्छी बातें बताते हैं। वो इस किताब के बारे में लिखते हैं, ‘इस विचोरोत्तेजक पुस्तक में उनके लेखों के पढ़ने पर आप खुद महसूस करेंगे कि आपने एक संग्रहणीय पुस्तक हाथ में उठाई है’। इस किताब में रीतिका खेड़ा के कई लेख हैं जो उनके मीडिया में छपे हैं। जो 2012 से मार्च 2019 के बीच के हैं। आधार किसलिए आया था? उसका मकसद क्या था? उसे लोगों के बीच कैसे पहुंचाया? ये सब आपको शुरूआत में पढ़ने को मिल जाएगा।

आप जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं आपको आधार का वो स्याह पक्ष पता चलता है जो सरकार जनता से दूर रखती है। आधार इसलिए बनाया गया था ताकि लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिले, बिचौलिये खत्म हों, भ्रष्टाचार खत्म हो। ऐसा तो कुछ हुआ नहीं लेकिन कई सारी समस्याएं लोगों के सामने आ गईं। कई राज्यों में लोगों को राशन नहीं मिला क्योंकि उनका राशन काॅर्ड आधार से लिंक नहीं था। जिनका आधार लिंक था कई बार उनको भी दिक्कतों का सामना करना पड़ता। इस वजह से कई लोगों की मौत भी हुई। तथ्य, कहानियां और आंकड़े सभी आपको इस किताब में मिल जाएंगे।



रीतिका इस किताब में लिखती है आधार हमेशा-से स्वैच्छिक था लेकिन उसे इस तरह प्रसार किया गया कि आधार बहुत जरूरी है। अगर आपके पास आधार नहीं है तो आपका जीवन मुश्किल में पड़ जाएगा। कई उदाहरण ऐसे हैं जो बताते हैं कि आधार आने से लोगों का जीवन खराब ही हुआ। पहले एक बुजुर्ग का पैसा डाकिया गांव देने आता था। अब उसे बैंक जाना पड़ता है और अगर बायोमैट्रक सही काम नहीं की तो उसे खाली हाथ वापस लौटना पड़ता है। रीतिका बताती है आधार आने से न भ्रष्टाचार कम हुआ और न ही बिचौलिये लिए भागे। अगर कुछ हुआ तो डाटा को जुटाया गया। आधार प्रोजेक्ट से सरकार के पास हर किसी की प्रोफाइल है। अब वो हर व्यक्ति के बारे में पूरी जानकारी जानता है। आप क्या खा रहे हैं? कहां जा रहे हैं? किस से बात कर रहे हैं? पैसों का लेन-देन। सब कुछ आपने सरकार को आधार के जरिये बता दिया है। क्या ये निजता का हनन नहीं है? क्या ये हमारी जिंदगी में तांक-झांक नहीं हैं।

डेटा क्या कर सकता है? इस बारे में रीतिका दो शख्स का जिक्र इस किताब में करती हैं, एडवर्ड स्नोडेन और क्रिस वाइली। इन दो लोगों ने अलग-अलग समय पर लोगों को बताया कि कैसे निजी जानकारी का इस्तेमाल किया जा सकता है? वो आशंका जाहिर करती हैं कि आधार से हमारा डाटा बहुत बड़ा हो गया है और इसका उपयोग किया जा रहा है। वो बताती हैं कि कंपनियां इसका उपयोग कर रही हैं, वे एयरटेल पेमेंट्स का उदाहरण देती हैं। रीतिका किताब में बार-बार इस बात पर जोर देती हैं कि लगातार दस सालों से सरकार हमें बता रही है कि आधार जीने के लिए, गरीबों तक हक पहुंचाने के लिए जरूरी है। जिस मकसद का हवाला देकर सरकार इसे लाई थी, वो आधार के बिना भी हो सकता है। वो छत्तीसगढ़ और झारखंड का उदाहरण इस बारे में देती हैं। कुल मिलाकर किताब में साफ-साफ लिखा है कि आधार से लोगों का उद्धार तो बिल्कुल भी नहीं हुआ है।

क्यों पढ़ें इसे?


आधार से आजकल हर कोई जुड़ा हुआ है। उससे क्या नुकसान है? उससे क्या समस्या आ रही हैं? वो हमारी निजता का हनन कैसे है? ये सब जानने के लिए आपको ये किताब जरूर पढ़नी चाहिए। तथ्यों और आंकड़ों से भरी पड़ी है ये किताब। जानकारी के लिए, जागरूकता के लिए आपको इस किताब को पढ़ना चाहिए। आप ज्यों-ज्यों इस किताब को पढ़ेंगे, आपके मन में कई सवाल आएंगे। आप आधार के बारे में सोचना शुरू कर देंगे और शायद यही तो उद्देश्य है इस किताब का। किताब में अगर मैं खामी की बात करूं तो सिर्फ बर्तनी ही बहुत कम जगह पर गड़बड़ है। इतनी महत्वपूर्ण जानकारी वाली किताब में ऐसी त्रुटियों को अनदेखा किया जा सकता है।



आखिर में बस इतना ही कहना चाहूंगा कि आधार पर रीतिका खेड़ा ने बेहतरीन किताब लिखी है। ये किताब आधार की पूरी कहानी को बताती है। उसके आर्थिक, तकनीकी और सामाजिक पक्षों के बारे में भी बताती है। रीतिका इस किताब में बताती है कि आप आधार के बारे में सोचती भी नहीं अगर उनके पास 2010 में आधार के ही दो अधिकारी नहीं आते। अगर आप आधार को सुधार समझते हैं तो आपको जानना चाहिए कि आधार से किसका उद्धार हुआ है।

किताब- आधार से किसका उद्धार
लेखिका- रीतिका खेड़ा
प्रकाशक- सार्थक राजकमल प्रकाशन का उपक्रम
कीमत- 125 रुपए।

Wednesday, 9 October 2019

आज भी खरे हैं तालाबः तालाब और पानी को समझाने वाला खजाना

‘कुछ बातें बार-बार कहनी पड़ती हैं, उन बातों में पानी एक है।’ ये पंक्ति इस किताब की नहीं है लेकिन इसे लिखने वाले नेे ये 
बात कही है। लेखक ने सही ही कहा है, हम पानी की बात ही कहां करते हैं? बड़े शहरों में तो पानी की चर्चा सिर्फ कुछ दिवसों तक ही सीमित रहती है। हम नहीं सोचते कि आखिर हम पानी के उपभोक्ता कब से बन गए? हमारे पास इस बात का भी सोचने का समय नहीं है कि ये स्थिति कैसे और कब बनी? हालात जैसे बनते गए, हम उसके आदी होते गए। आपके इन न पूछे जाने वाले सवालों का जवाब देती ये किताब।

आज भी खरे हैं तालाब।

पानी के गणित को समझने के लिए, पानी को समझने के लिए, हमारे पुराने और बेहतरीन समाज को जानने का एक बेहतरीन दस्तावेज है ये किताब। ‘आज भी खरे हैं तालाब’ पुस्तक में आपको तालाब के बारे में जानकारी मिलेगी। भारत में कभी 24 लाख तालाब थे और आज सिर्फ 2 लाख बचे हैं। इनके बनने और खत्म होने के बारे में किताब में अच्छी तरह से दिया गया है। अगर आपको तालाब और उसकी पद्धति को बहुत अच्छी तरह से समझना है तो इस किताब से बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता।

लेखक के बारे में 


पानी के बारे में इस शानदार किताब को लिखा है अनुपम मिश्र ने। कहा जाता है कि अनुपम मिश्र को जानना है तो ‘आज भी खरे हैं तालाब’ पढ़ लीजिए। अनुपम मिश्र जीवन भर पर्यावरण के लिए काम करते रहे। उन्होंने जमीन पर रहकर पानी का काम करने वाले लोगों को करीब से देखा है। उन्होंने राजस्थान के अलवर में जल संरक्षण का काम शुरू किया। उसके बाद उत्तराखंड में भी ऐसा ही कुछ किया।

अनुपम मिश्र।

अनुपम मिश्र का जन्म 1948 में महाराष्ट्र के वर्धा में हुआ था। बहुत कम लोगों को पता है अनुपम मिश्र हिन्दी के प्रसिद्ध कवि भवानी प्रसाद मिश्र के बेटे हैं। अनुपम मिश्र ने चिपको आंदोलन में जंगलों को बचाने में मदद की थी। इस किताब के लिए अनुपम मिश्र को 2011 में जमनालाल बजाज पुरस्कार से सम्मानित किया। आज भी तालाब हैं खरे 19 भाषाओं में अनुवादित हो चुकी है। 2009 तक इस किताब की 1 लाख से ज्यादा प्रतियां बिक चुुकी थीं। गांधीजी की ‘माय एक्सपेरिमेंट्स विथ ट्रुथ’ के बाद सिर्फ यही बुक ब्रेल लिपि में उपलब्ध है। अनुपम मिश्र का निधन 19 दिसंबर 2016 को हुआ था। अनुपम मिश्र ने इस किताब के अलावा 17 छोटी-बड़ी किताबें लिखी हैं। जिनमें से कुछ बहुत फेमस हैं, ‘साफ माथे का समाज’ और ‘राजस्थान की रजत बूंदें’।

आज भी खरे हैं तालाबः किताब की नजर से


किताब शुरू होती है एक कहानी से। कहानी जिसमें पारस है किसान है और एक राजा है। इस कहानी का अंत होता है राजा के एक वाक्य से, ‘जाओ! अच्छे-अच्छे काम करते जाना और तालाब बनाते जाना। बस तभी एक हर गांव में तालाबों की परंपरा हो गई। जहां तालाब होते, वहीं गांव बसे रहते। गांव के नाम इन्हीं तालाबों के नाम पर पड़ा करते थे। तालाब पहले पूरे भारत की धड़कन हुआ करते थे। इन्हें सिर्फ राजा नहीं लोग बनाया करते थे। सिर्फ बनाया नहीं करते थे, उनकी रक्षा भी करते थे। पहले अगर कुछ करना होता था तो तालाब बनाया जाता था। तालाब बनवाता एक था और सहयोग पूरा समाज करता था। तालाब बनना एक त्यौहार होता था। जिसे गांव के लोग साथ मिलकर मनाते थे। इस किताब में तालाब बनाने की देसी पद्धति बताई गई है। वो कहानी की तरह बताई गई है, जिसे पढ़कर आपको वहां होने का एहसास होगा। तालाब की जगह और दिशा को बड़े जतन से चुना जाता है। तालाब की इस विधि में आगौर, पाल, बाड़, गरट, गौरा, नेष्टा बनाने होते हैं। इन सबके बारे में अच्छे से समझाती है ये किताब। इस किताब को पढ़कर आप एक अच्छा तालाब बना सकते हैं।


सैकड़ों, हजारों और लाखों तालाब ऐसे ही अचानक प्रकट नहीं हुए थे। इसे बनाने वाले भी कुछ लोग थे और इसको संभालने वाले भी। देश के अलग-अलग हिस्सों में इनके अलग-अलग नाम थे। लेकिन कुछ सालों में हमने ऐसे लोगों को खो दिया और हम हजारों, लाखों तालाबों को शून्य की ओर ले जा रहे हैं। ये किताब बताती है कि पहले का समाज भी बहुत अच्छा था। तालाब को बनाने वाले और संभालने वालों का बहुत सम्मान हुआ करता था। वैसा ही जैसा आज डाॅक्टर का हुआ करता था। इन लोगों को आदर के रूप में उपहार भी मिलते थे। तालाब बनाने वाले ये लोग हिंदू और मुसलमान दोनों हुआ करते थे। इन लोगों का एक समुदाय हुआ करता था। जहां वो रहते थे, उस जगह का नाम भी वही पड़ जाता था। ये लोग बहुत सालों तक बने रहे क्योंकि ये लोग अपने शिष्यों को भी यही काम सिखाते थे। ये तालाब बनाने वाले कुछ नाम थे, गजधर, सिलावटा, जोड़िया, सिरभाव, जलसूंघा, पथरोट और टकारी। ये नाम अलग-अलग क्षेत्रों में बदलते गए। जैसे आज धन स्वाभिमान का प्रतीक है, पहले तालाब स्वाभिमान का प्रतीक हुआ करता था। तालाब रहते तो गांव रहता और तालाब सूखते तो गांव उजड़ जाते। तालाब में हर साल पानी आता है और हर साल जाता है। बस उसे बचाने का तरीका आना चाहिए। उसे तस्करी से बचाना आना चाहिए, ये तस्करी लोग नहीं सूरज करता है।

इस किताब में कई लोगों के बारे में भी बताया गया है, जो तालाब को अकेले बचाने का काम करते थे। ऐसे ही ‘गैंगजी’ के बारे में इस किताब में वर्णन दिया गया है। वे तालाब की रक्षक बने और लोगों ने उन्हें इसी वजह से संत बना दिया। पहले सिर्फ तालाब बनाया नहीं जाता था, उसकी बार-बार सफाई की जाती है। तालाबों से आज समाज कटने की सबसे बड़ी समस्या रख रखाव है। प्रशासन सफाई की जगह पर नया तालाब बनाने की बात करती है। लेकिन वो नहीं समझते कि पुराने तालाब कितने कामगर होते हैं। तब तालाब थे क्योंकि समाज अच्छा था। तालाब के या समुदाय के नाम पर उस जगह का नाम रखा जाता था। लेकिन ये किताब ये बताती है कि अलअलग तालाबों के अपने-अपने गुण होते हैं और उन्हीं गुणों के आधार पर तालाबों के नाम रखे जाते थे। सागर, सरोवर, सर, जोहड़-जोहड़ी, बंध-बंधिया, ताल-तलैया, पोखर-पोखरी, पुष्करणी, डिग्गी, कुंड, हौज, ताल, चाल, खाल और चौखरा। ये सभी नाम तालाबों अपने-अपने कुछ गुणों की वजह से रखे गए हैं। इस किताब में राजस्थान के घड़सीसर तालाब के बारे में दिया गया है। लेखक ने इसके बारे में खूब विस्तार से लिखा है।


किताब में गुणों, समाज, आकार और धर्म के लिए तालाब बनाने के बारे में भी जिक्र है। छत्तीसगढ़ में छेरा-छेरा त्यौहार तालाब के लिए ही मनाया जाता है। इसी तरह बुंदेलखंड में भी पूने के दिन हजार सालों तक नया तालाब बनते रहे। इस तरह राजस्थान में नवरात्र के आखिरी दिन तालाब  पर जुटते हैं। जिससे पता चलता कि इस बार उनके तालाब में कितना पानी आया है? हम आज तालाब को नहीं जानते उसकी गलती हमारी तो है ही, अंग्रेजों की भी। समाज से तालाब को दूर किया अंग्रेजों ने। हम तालाब से दूर होते गए और तालाब खत्म हो गए। गजधर आज होते तो बताते कि हम संकट के समय से गुजर रहे हैं। अब तालाब से हमारी दूरी उतनी ही है, जितनी जमीन और आसमां की। अब तालाब से समाज भी दूर है और राज भी। पानी के इस संकट से बचने के लिए हमें फिर से साफ माथे का समाज बनना होगा। तभी कह पाओगे आज भी खरे हैं तालाब। वरना ये किताब सिर्फ एक दस्तावेज है, जिसे बस एक बार आंख भर के देख लिया गया है।

क्या-क्या अच्छा?


ये किताब रोचक और दुर्लभ जानकारी से भरी हुई है। लेखनी बेहद सरल और सहज है। बिल्कुल सरल शब्दों में लिखा गया है और लिखे को बहुत अच्छे तरीके से समझाया गया है। कभी उदाहरण के रूप में तो कभी कहानी के रूप में। आपको पढ़ते समय कभी भी बोर नहीं होंगे। पानी, समाज और तालाब के बारे में बहुत सारे किस्से, कहानी और भी ज्यादा खास बना देते हैं। हो सकता है कि आप तालाब बनाने की विधि भूल सकते हैं, लेकिन उसका किस्सा जरूर याद रहेगा। इस किताब को एक चीज और रोचक बनाती है, संदर्भ। लेखक ने संदर्भों के बारे में विस्तार से बताया है। किताब के लिए क्या लिया, कहां से लिया और कैसे  लिया, इन सबके बारे में बताया गया है।  किस विषयवस्तु के लिए किस शख्स से बात की, ये भी अच्छे से बताया गया है।

किताब का एक अंश।

अनुपम मिश्र की ये किताब एक खजाना है, आज के संकट से उबरने के लिए। अनुपम मिश्र की ये किताब बूंदों, तालाब के महत्व और हमारी बेवकूफी के बारे में बताती है। इसे सुधारा भी जा सकता है, फिर भी अगर हम नहीं सुधरे तो इसके हालात बहुत बुरे होंगे। अनुपम मिश्र के शब्दों में कहूं तो, हमारे बड़े लोग जीडीपी, विकास, अर्थव्यवस्था पर बहुत चिंता करते हैं। अगर पानी पर ध्यान नहीं दिया तो इन पर कभी भी पानी फिर सकता है। आखिर में तालाब के बारे में इस किताब में ‘सीता बावड़ी’ के नाम की कविताः

बीचों बीच है एक बिंदु,
जो जीवन का प्रतीक है,
मुख्य आयत के भीतर लहरे हैं,
बाहर हैं सीढ़ियां।
चारों कानों पर फूल हैं,
जो जीवन को सुगंध से भर देते हैं।
पानी पर आधारित
एक पूरे जीवन दर्शन को
इतने सरल सरस ढंग से
आठ-दस रेखाओं में
उतार पाना एक कठिन काम है।
लेकिन हमारे समाज का बड़ा हिस्सा
बहुत सहजता के साथ
इस बावड़ी को
गुदने की तरह
अपने तन पर उकेरता है।

किताब- आज भी खरे हैं तालाब।
लेखक- अनुपम मिश्र।
प्रकाशक- प्रभात पैपरबैक्स।
कीमत- 125 रुपए।

इस किताब को इस लिंक पर जाकर खरीद सकते हैंः-

आज भी खरे हैं तालाब।

Sunday, 15 September 2019

इनसाइड स्टोरी ऑफ इमरजेंसीः आजाद भारत के काले अध्याय पर सबसे जरूरी किताब

आपातकाल, आजाद भारत का सबसे काला अध्याय। लेकिन इसके बारे में हम जानते कितना है? स्कूल की पढ़ाई में आपातकाल का जिक्र ही नहीं हुआ। जब काॅलेज आया तब पता चला कि आपातकाल जैसा कुछ हुआ था। उसमें भी आधी-अधूरी बात बताई गई, जैसे कि इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आया, नेताओं को जेल में ठूंस दिया गया, उसके बाद दो साल तक देश तानाशाही में चला। लेकिन उस दो साल में क्या-क्या हुआ, ये पता नहीं चला? इस किताब में इमरजेंसी के बारे में बड़ी गहराई से लिखा गया है। इसमें आपातकाल के तानाशाह के रवैये को बताया गया है जिसे सरकार अनुशासन का नाम दे रही थी। किताब अपने नाम के हिसाब से बिल्कुल फिट बैठती है, इमरजेंसी की इनसाइड स्टोरी।


लेखक के बारे में


लेखक
किताब इनसाइड स्टोरी ऑफ इमरजेंसी का हिंदी अनुवाद है। इसको लिखा है वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने। कुलदीप नैयर का जन्म 1923 में सियालकोट में हुआ था। वहां उन्होंने लाहौर यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की। बंटवारे के समय दिल्ली आ गए और यहां अपने कैरियर की शुरूआत उर्दू अखबार ‘अंजाम’ के साथ की। वे लाल बहादुर शास्त्री के सूचना अधिकारी जेंसीभी रहे। पत्रकारिता में वे काफी आगे गए। वे बाद ‘द स्टेट्समैन’ के संपादक और यूएनआई एजेंसी के प्रबंध संपादक भी रहे। कुलदीप नैयर का निधन 23 अगस्त 2018 को हुआ। इस किताब के अलावा कुलदीप नैयर ने लगभग 17 किताबें लिखीं। जिनमें सबसे चर्चित स्कूप और एक जिंदगी काफी नहीं है।


इमरजेंसीः किताब की नजर से


इमरजेंसी पर बहुत सारी किताबें लिखी गई हैं, जैसे काॅमी कपूर की द इमरजेंसी, बिपिन चन्द्रा की इन द नेम ऑफ डेमोक्रेसी, ऐसी ही अनगिनत किताबें हैं। मैंने इनमें से कोई भी किताब नहीं पढ़ी है। लेकिन इस एक किताब ने मुझे इमरजेंसी के बारे में सब कुछ बता दिया। मैं ये तो नहीं कह सकता कि ये किताब आपातकाल पर सबसे अच्छी किताब है। लेकिन इतना जरूर कह सकता हूं कि इसको पढ़ने के बाद आप आपातकाल को अच्छी तरह से समझ पाएंगे। कुलदीप नैयर ने इस किताब में आपातकाल की हर महत्वपूर्ण घटना के बारे में बताया है और उसके पीछे की कहानी को भी बताया है। किताब बड़े ही सुनियोजित शैली में लिखी गई है जो उस फैसले के दिन से शुरू होती है और खत्म होती है और खत्म होती है जनता पार्टी के टकराव पर।

इमरजेंसी की इनसाइड स्टोरी, बुक के नाम से ही पता चल रहा है कि किताब में बहुत कुछ ऐसा है जो बहुत अंदर का है। किताब शुरू होती है 12 जून 1975 से। जब इलाहाबाद हाईकोर्ट में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसला आने वाला था। इसके पीछे की कहानी आपको इस किताब में पता चलेगी। आपको पता चलेगा कि क्यों जस्टिस सिन्हा 20 दिनों तक अपने घर से नहीं निकले थे? क्यों सिन्हा का टाइपराइटर फैसले के एक दिन पहले घर छोड़कर भाग गया था? इसके बाद ऐतहासिक फैसला आता है और उसी फैसले की वजह से देश में लगता है आपातकाल। आपातकाल और इलाहाबाद हाइकोर्ट के फैसले के बीच 13 दिन तक समय था। उस 13 दिन की कहानी भी इस किताब में है।

इसके बाद आपातकाल लगा और पूरे देश से नेताओं और लोगों को जेल में ठूंस दिया गया। अखबारों पर सेंसरशिप लागू कर दी गई। जो नहीं मानता उसका लाइसेंस रद्द कर दिया गया। उसके बाद दो साल तक जो तानाशाही चली उसकी पूरी कहानी इस किताब में है। सरकार कितनी क्रूर हो सकती है, ये इस किताब को पढ़कर समझ में आता है। कई लोगों को तो मौत के घाट उतार दिया गया। इसमें एक नाम जरूर याद रखा जाना चाहिए, स्नेहलता रेड्डी। जो एक कन्नड़ फिल्म अभिनेत्री थी। उसकी दोस्ती जाॅर्ज फर्नांडिस से थी। उसी दोस्ती ने उसे पहले जेल पहले पहुंचाया और यातनाएं दी गईं कि वो मर गई। इससे भी दर्दनाक जाॅर्ज फर्नांडिस के भाई लाॅरेंस फर्नाडिंस के साथ हुआ। ऐसे ही तमाम किस्से इसमें दिये गये हैं। संविधान जो इस देश की आत्मा है। उसे छलनी करने का काम इस इमरजेंसी ने किया। एक व्यक्ति को बचाने के लिए संशोधन किये। ये तब हुआ, जब उसके आधे से ज्यादा सदस्य तो जेल में था। विपक्ष न होने के बावजूद विपक्ष संसद में था। ये उन दिनों के संसद के भाषणों से समझा जा सकता है। इसके बाद अचानक जाने क्या हुआ और तानाशाह ने सबको रिहा कर दिया। 1977 के चुनाव होने वाले थे। लोकतंत्र बनाम तानाशाह की लड़ाई हुई, जीता लोकतंत्र।

क्या अच्छा, क्या कमी?


किताब कई लिहाज से अच्छी है। कुलदीप नैयर ने जिस प्रकार से इस किताब को लिखा है, वो लाजवाब है। लिखने की भाषा और शैली साधारण और सरल है। किताब जानकारियों से भरी हुई है। चाहे वो इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला हो, संजय का बेबाक रवैया हो, सारे नेताओं की चमचागिरी हो या फिर संविधान में संशोधन की बात हो। ये सारी बातें आपको किताब में किस्से के रूप में मिलेंगी। जो आपको बहूत कुछ सोचने और समझने में मदद करेगी। किताब में ऐसा कुछ भी नहीं है जो आपको कन्फ्यूज करेगा।

किताब में कुछ खामी हैं जो मुझे लगती हैं। कहीं-कहीं पर किसी जानकारी को सपाट तरीके से दिया गया है। जबकि वो किस्सा थोड़ा बड़ा हो सकता था। लेकिन ये लेखक की समझ पर निर्भर करता है कि वो क्या रखना चाहता है। दूसरी और अंतिम खामी मुझे ये लगी कि किताब में सत्ता पक्ष के बारे में बहुत बताया गया है। लेकिन जिन कैदियों को जेल में रखा गया था उनके साथ जेल में क्या हुआ था? उनके ढाई साल जेल में कैसे गुजरे? एक पाठक के तौर पर मैं उस पहलू को भी जानना चाहता था कि लेकिन वो बहुत कम है।

किताब से कुछ अंश


एक घंटे तक पुलिस ने मेरा बयान दर्ज किया और फिर मुझे जासूसों के एक दल के पास ले गए। वहां मुझे अचानक किसी ने थप्पड़ जड़ दिया। जब मुझे होश आया वे मुझे निर्वस्त्र कर चुके थे। वहां करीब 10 लोग थे और उन्होंने मुझे पीटना शुरू कर दिया। चार लाठियां टूट गईं। वे मेरे शरीर के हर एक अंग पर वार कर रहे थे। मैं फर्श पर पड़ा कराह रहा था। मैंने भीख मांगी, रेंगने लगा और फिर रहम की भीख मांगी। इस बीच वे मुझे फुटबाल की तरह लातों से मारते रहे।

ऊपर जो किस्सा दिया गया है वो लाॅरेंस फर्नांडिस का है। जिन्हें बहुत दर्दनाक यातना दी गई थी। ये तो बस एक छोटा-सी झलक है। आखिर में यही कहना चाहूंगा कि हर भारतीय को इस किताब को पढ़ना चाहिए। हमें पढ़ना चाहिए क्योंकि हम समझ पाएंगे उस दौर के बारे में। किताब को पढ़ने के बाद यही लगता है कि क्या सच में सरकार कितनी क्रूर हो सकती है? इसलिए सवाल करने बहुत जरूरी है तभी तो सरकार जनता की कीमत समझेगी। जो कहते हैं इमरजेंसी, अनुशासन की कार्रवाई थी उनको इस किताब को जरूर पढ़नी चाहिए। आजाद भारत के सबसे काले अध्याय पर लिखी ये सबसे जरूरी किताब है।

किताब- इमरजेंसी का इनसाइड स्टोरी।
लेखक- कुलदीप नैयर।
प्रकाशक- प्रभात पेपरबैक्स। 
कीमत- 250 रुपए।

कुलदीप नैयर की इस किताब को यहां खरीदें-

इमरजेंसी की इनसाइड स्टोरी

Saturday, 24 August 2019

50 दिन, 50 साल पहले: आजादी के 50 दिन पहले की कहानी बताती है ये किताब

एक किताब बहुत कुछ दे जाती है जानकारी, एक सोच और कुछ अच्छी बातें। अगर किताब इतिहास की होती है तो उसे रोचक क्या बनाता है? इतिहास की कहानियां, किस्से या कुछ महत्वपूर्ण कथन। लेकिन एक इतिहास की किताब में ये सब न हो। क्या तब भी वो उसे अच्छा कहा जाएगा? इस किताब को पढ़ने से पहले मेरा जवाब ‘न’ में होता। इस किताब के बारे में इतना तो मैं कह ही सकता हूं कि एक किताब सिर्फ जानकारियों से भी अच्छी हो सकती है। किताब का नाम है- 50 दिन 50 साल पहले। ये सिर्फ एक किताब नहीं है, ये एक डायरी है, आजादी के 50 दिन पहले की डायरी। जो किसी एक व्यक्ति की डायरी नहीं है, ये 1947 के हिंदुस्तान की डायरी है।



इस किताब की अच्छी बात ही यही है कि ये किसी एक पर फोकस नहीं है। इसमें करीब-करीब 200 से ज्यादा लोगों के नाम आये हैं। जिनमें से बहुतों के नाम हमने सुने होंगे और बहुतों के नहीं। कुछ लोगों का तो बस नाम दिया है उनके बारे में कुछ भी नहीं बताया गया है। ये किताब आपको कुछ नये नामों से रूबरू भी कराती है जो आपकी उत्सुकता को बढ़ाती है और शायद बाद में आप उनके बारे में खोजें। लेखक की लेखनी इतनी कठिन नहीं है जिसे आप समझ न पाएं। एक इतिहास की किताबें जिस भाषा में होती हैं, ये किताब भी उसी भाषा के करीब ही है। इस किताब को पढ़ा जाना चाहिए अपनी जानकारी के लिए, इस किताब को पढ़ा जाना चाहिए उस दौर को समझने के लिए, उस समय के माहौल को समझने के लिए और सबसे बड़ी बात उस दौर की सियासत को समझने के लिए।

किताब के लेखक।
इस किताब को लिखा है वरिष्ठ पत्रकार मधुकर उपाध्याय ने। ये किताब 1997 में प्रकाशित हुई थी। मधुकर उपाध्याय मूलतः अयोध्या उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। उन्होंने ग्रेजुएशन उत्तर प्रदेश से ही की। उसके बाद भारतीय जनसंचार संस्थान नई दिल्ली से एक साल का पत्रकारिता में डिप्लोमा किया। बाद में 1990 में वे बी.बी.सी हिंदी में काम करने लगे। उससे पहले उन्होंने दो दशक तक भारतीय समाचार पत्रों में काम किया। मधुकर उपाध्याय इतिहास में खासी रूचि रखते हैं और इसी दिलचस्पी की वजह से उन्होंने गांधीजी की दाण्डी यात्रा की पुनरावृत्ति की। मधुकर उपाध्याय ने पैदल 400 किलोमीटर की पैदल यात्रा की। मेरी जानकारी में इस किताब के अलावा उनकी दो और किताबें प्रकाशित हुई हैं, पृथिवी और पंचलाइन।

किताब के बारे में


इस किताब के बारे में काफी कुछ कवर पेज और उसके नाम से ही समझा जा सकता है। कवर पेज में मुस्कुराते जवाहर लाल नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना दिख रहे हैं और नीचे की तस्वीर में लोगों से घिरे महात्मा गांधी की तस्वीर है। आपको किताब में जिन्ना और जवाहर लाल नेहरू का खूब जिक्र मिलेगा। महात्मा गांधी बयान, दंगों को रोकने के लिए उनकी यात्राएं और प्रार्थना सभा का जिक्र भी काफी है। जैसा कि किताब के नाम से पता चल रहा है कि 15 अगस्त 1947 से 50 दिन पहले उस हिंदुस्तान में क्या सब हो रहा था? ये सब किताब में है। लेकिन यहां एक बात समझना जरूरी है कि इसमें न कोई किस्सा है, न किसी को महान बताया है और न ही किसी को छोटा। बस हर रोज जो-जो हो रहा था, बड़े और छोटे नेताओं ने जो कहा था वो सब ज्यों का त्यों रख दिया गया है।

किताब का पहला पन्ना।

किताब को दो पेजों से भी समझा जा सकता है पहले और आखिरी। दोनों पेज पर दो अलग-अलग नक्शे हैं। पहले नक्शे में मार्च 1947 के हिंदुस्तान का नक्शा है और दूसरे में 15 अगस्त 1947 का नक्शा है। उस पहले नक्शे से दूसरे नक्शे तक की बनने की पूरी कहानी है इस किताब में। किताब में सबसे पहली जो तारीख दी गई है वो है 22 मार्च 1947। जब लाॅर्ड माउंटबेटन को हिंदुस्तान का आखिरी वायसराय बनाकर भेजा गया था। बस यही से सब शुरू होता है। उस एक चैप्टर में लेखक 22 मार्च 1947 से 25 जून 1947 तक की कहानी संक्षेप में बता देते हैं। इस चैप्टर में जिन लोगों के इर्द-गिर्द बताया जाता है किताब के अंत तक इनके बीच में ही सब कुछ बताया जाता है। ये महत्वपूर्ण लोग हैं, वायसराय लाॅर्ड माउंटबेटन, जवाहर लाल नेहरू, महात्मा गांधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल, मोहम्मद अली जिन्ना और लाॅर्ड लिस्टोवेल। इसके बाद हर एक दिन के बारे में किताब में दिया गया है, जो बहुत लंबा नहीं है। हर दिन को एक पेज में समेटा गया है। लेकिन जिस प्रकार से लिखा गया है वो महत्वपूर्ण है। आज जब हम तकनीक के दौर में आ गये हैं तब चिट्ठियों के बारे में पढ़ना वाकई अच्छा लगता है। चिट्ठियों का खूब जिक्र है, हर रोज जिक्र है। उस समय के बारे में लेखक ने अधिकतर खतों के माध्यम से बताया है। माउंटबेटन, नेहरू, जिन्ना और गांधी आपस में संदेश खतों के माध्यम से ही पहुंचाते थे।

हम सबको मोटा-माटी पता है कि उस समय देश में क्या हो रहा था? लेकिन देश की सियासत में 50 रोज क्या-क्या फैसले लिए गये? बंटवारा कैसे हुआ? महात्मा गांधी इस पर हर रोज क्या कह रहे थे? वे क्यों जिन्ना को अच्छा और माउंटबेटन को चालाक कह रहे थे? इन सबके अलावा इसे बेहतरीन बनाती है किताब के चित्र। किताब में एक पेज पर एक दिन के बारे में बताया गया है और उसके ठीक बगल वाले पेज पर फोटो भी हैं। फोटो को शब्दों से ज्यादा प्रभावी माना जाता है। फोटों में उस दौर के अखबार भी हैं जिसमें पाकिस्तान बनने के बारे में भी है और माउंटबेटन के गर्वनर जनरल के बारे में भी। इस किताब को पढ़ते वक्त आपको लगेगा कि आप कुछ खास पढ़ रहे हैं, कुछ नायाब-सा। इसके पीले, पुराने पन्ने इस किताब को पुराना तो बनाते हैं लेकिन इसके असर को कम नहीं कर पाते या यूं कहें कि इसका पुरानापन ही इसे खास बनाता है। किताब के अंत होता है महात्मा गांधी के 15 अगस्त वाले बयान से जिसमें वो बी.बी.सी. से कहते हैं, भूल जाइए कि कभी मुझे अंग्रेजी आती थी।

किताब का हर पेज कुछ इसी तरह से दिखता है।

किताब की खूबी


किताब की सबसे बड़ी खूबी वो दौर है जिसके बारे में लिखा गया है। जिसके बारे में जितना भी लिखा जाए पढ़ा ही जायेगा। आजादी के पहले के हिंदुस्तान को हर कोई जानना चाहेगा। इसकी कोई विचारधारा नहीं है सीधे-सपाट शब्दों में उस दिन के बारे में बता दिया गया है। इसमें बहुत कुछ समझने को है, बहुत कुछ जानने के लिए है। किताब कुछ लोगों पर ज्यादा फोकस है जिससे आप 50 दिन में उनके बारे में आसानी से समझ सकते हैं।

कौन पढ़े?


किताब इतनी अच्छी है कि इसे हर किसी को पढ़ना चाहिए। भाषा शैली भले ही साहित्यिक न हो। लेकिन जानकारी इतनी है कि इस किताब को पढ़ा ही जाना चाहिए। जो अभी-अभी किताबों को पढ़ना शुरू कर रहे हैं उनके लिए इससे शुरू करना अच्छा रहेगा। क्योंकि 100 पेज की ये किताब जल्दी ही खत्म हो जाएगी। शुरू में हो सकता है आपको इसमें बोरियत आये लेकिन जैसे ही आप आगे बढ़ेंगे तो पीछे की बातें समझमें आने लगती है और फिर बोरियत दूर होने लगती है। 

किताब का अंश

दिल्ली और कराची में माहौल कुल मिलाकर एक जैसा था। लोग, आदमी, औरतें, बच्चे सड़कों पर थे। दिल्ली में तिरंगा और कराची में पाकिस्तान का झंडा हर जगह लहरा रहा था। शहर के कोने-कोने में जुलूस निकाले जा रहा था। पता ही नहीं चल रहा था कि एक कहां खत्म हुआ और दूसरा कहां शुरू। यही हाल हर शहर, कस्बा और गांव का था। गर्वनमेंट हाउस में माउंटबेटन ने जिन्ना के साथ समारोह में जाने से पहले कहा, आप पर हमले और हत्या का खतरा अभी टला नहीं है। बेहतर होगा कि आप बंद कार में जाएं। जिन्ना ने ऐसा नहीं किया और खुली कार से गये। तीस तोपों की सलामी हुई और ‘कायदे आजम जिंदाबाद’ के नारे गूंजते रहे। माउंटबेटन ने जिन्ना से कहा- हम दोस्तों की तरह अलग हो रहे हैं जो एक दूसरे की इज्जत करते हैं। शाम को प्रार्थना सभा में महात्मा गांधी ने कहा, कल हम आजाद हो जाएंगे पर आज आधी रात को देश के दो टुकड़े हो जाएंगे।


ये किताब कोई कहानी नहीं सुनाती, किसी के बारे में भी नहीं बताती। जो उन 50 दिनों में घटा, जो उस समय हुआ, जो उस समय कहा गया। वो सब इस किताब में पिरोया गया है। हो सकता है बहुत कुछ छूट गया हो लेकिन जो लेखक ने बताया है वो बेहद महत्वपूर्ण है, जो उसे पढ़ा जाना चाहिए।

किताब- 50 दिन 50 साल पहले।
लेखक- मधुकर उपाध्याय।
प्रकाशकः सारांश प्रकाशन प्रा. लि.।
कुल पेज- 119। 
कीमत- 395 रुपए।

Friday, 19 April 2019

लेेखन के संसार में ये किताब एक अलग कहानी की तरह है, जिसे सबको पढ़ना चाहिये

कहानी, कविता लिखने की सबकी शैली और भाषा अलग होती है। लेखन की शैली ही लेखक की पहचान बन जाती है। अच्छी शैली को पाठक पसंद करते हैं और याद रखते हैं। लेखक को फिर उसकी सिर्फ एक किताब से लेखन से याद रखते हैं। उस लेखक को मुरीद हो जाते हैं, ऐसे लेखक अपनी छाप छोड़ जाते हैं। मेरे लिये उस लिस्ट में सबसे ऊपर हैं मानव कौल। मानव कौल की हाल ही में मैंने एक किताब पढ़ी है ‘तुम्हारे बारे में’।



मानव कौल का लेखन मुझे लगता है कोई प्रयोग है जो अब तक किसी और ने नहीं किया। वो एक ही बात को, एक ही घटना को कई पहलुओं से बताते हैं। कभी वो बीमार व्यक्ति के बारे में बताते तो कभी बीमारी भी अपने बारे में बताती। उनका लेखन में कोई फिलाॅसफी दिखती है। उनकी बातें वहीं होती है जो हमारे आस-पास चल रहा होता है लेकिन उसे ही लिखना कितना कठिन है ये मानव कौल की लेखनी में झलकता है। वही लेखनी मानव कौल की इस किताब में है। इस किताब में मानव कौल ने अपने अंदर के मुड़े पन्नों को खोला है।





मानव कौल मूलतः कश्मीर के बारामूला में पैदा हुये लेकिन वे बढ़े हुये मध्य प्रदेश के होशंगाबाद में। मानव कौल फिल्मी दुनिया के जाने-माने नाम हैं। एक्टिंग के साथ वे थियेटर करते हैं और यही सब करते-करते लिख भी लेते हैं। तुम्हारे बारे में उनकी तीसरी किताब है। इससे पहले वे ‘ठीक तुम्हारे पीछे’ और ‘प्रेम कबूतर’ लिख चुके हैं। 


किताब के बारे में


‘ठीक तुम्हारे पीछे’ किताब में न कोई कहानी है और न ही कोई कविता है। इसमें तो छोटी-छोटी कुछ बातें हैं। जिसे लेखक ने चलते-चलते तो कभी एक जगह ठहरकर जो देखा और सोचा उसे शब्दों में पिरो दिया। लेकिन जिस तरह से वो पिरोया है वो बड़ा कमाल है। ज्यादातर बातें लेखक की बातें एक पेज में ही खत्म हो जाती हैं। कुछ बातें बहुत लंबी हैं जैसे भवानी भाई की कहानी और अपने रंगमंच की कहानी।

शुरुआत में पढ़ते हुये लगता है कि लेखक ने अपने छोटे-छोटे यात्रा विवरण लिख दिये है। जो कभी पहाड़ के बारे में होते तो कभी किसी बड़े शहर के बारे में। लेकिन जैसे-जैसे किताब को पढ़ते-जाते हैं तो पता चलता कि इसमें सिर्फ यात्रा विवरण नहीं है। वो जो पहले यात्रा विवरण लग रहे थे वो तो लेखक की उस जगह के बारे में, वहां के लोगों के बारे में सोच थी। जो सोच आगे चलकर मां, पिता और अपनी प्रेमिका के बारे में भी होती है।



वो अपने थियेटर के बारे में बताते, इन्हीं बातों में लेखक अपने गांव से मुंबई आने तक का सफर बता देता है। लेखक में साफगोई की रुमानियत है, एक खुशबू है जिसे लेखक ने बिखेरा है। किताब पढ़ते हुये लगता ही नहीं है कि लेखक ने कभी बातों को बनाया हुआ हो। ऐसा लगता है उसने जो जिया है, उसके साथ जो हुआ है वो उसने सब लिख दिया है। हर वो बात जो बताना चाहता है, हर वो वो बात जिसके बारे में वो सोचता है। किताब की सबसे बड़ी बात कोई विषय न होना है, वो विषय है तो लेखक की सोच है। जो प्रकृति को लेकर भी है और अपने देश को लेकर भी है।

किताब की ताकत है एक अनूठा प्रयोग जो हर पढ़ने वाले को पसंद आयेगी। जो बहुत घूमता है उसे तो ये किताब जरुरी पढ़नी चाहिये। एक जगह को कैसे देखना चाहिये उसके बारे में ये किताब बहुत अच्छे से बताती है। किताब में शब्द को भरमार उनको खोजकर एक जगह लिखा जा सकता है और सीखा जा सकता है। इस अनूठे प्रयोग की अच्छी बिसात है ‘तुम्हारे बारे में’।

किताब का कुछ अंश


आज सुबह कोई बहुत धीमे कदमों से पास आकर बुदबुदाया, धुंध है आज चारों तरफ। मैंने तुरंत बिस्तर छोड़ा और कुछ ही देर में मैं दिल्ली की धुंध से भरी सड़कों पर था। इन सड़को को देखकर लगता है कि किसी पेंटर ने सफेद रंग के बहुत से स्ट्रोक अभी-अभी मारे हैं और पेंटिंग अभी अधूरी है। आधा-अधूरा कितनी सारी कल्पनाओं को चेहरा देता है! सुंदर क्षण धुंध में तैरने लगते हैं। पास की नजर तेज हो जाती है और दूर सब धुंआ हो जाता है। पक्षियों के कलरव में कहीं पीछे मुझे एक चायवाले की टन-टन सुनाई देती है। मैं उस आवाज के पीछे जाता हूं और एक चाय की टपरी चित्र में उभरती है। तभी लगता है कि दिल्ली की ठंड में यह धुंध असल में चाय के बर्तन से निकल रही है।



किताब में लेखक ने लिखी तो होंगी शायद अपने मन की बातें और अपने ख्यालात। लेकिन ऐसे ही ख्यालात सबके हैं बस किताब में अब मिले हैं। ये बेहतरीन किताब है जो बोर नहीं करती, जो सोचने को मजबूर करती है, जो ख्यालों की दुनिया में ले जाती है। शुरु से लेकर अंत तक विषय बदलते रहे लेकिन जिस प्रकार से लिखा है वो कमाल है। लेेखन के संसार में ये किताब एक अलग कहानी की तरह है, जिसे सबको पढ़ना चाहिये।

किताब- ठीक तुम्हारे पीछे,लेखक मानव कौल,प्रकाशन- हिंद युग्म, पेज सं.- 208।