Friday, 19 June 2020

गर फिरदौसः ये फिरदौस की कहानी है! फिरदौस यानी कि जन्नत, फिरदौस मतलब कश्मीर

कश्मीर को जन्नत कहा गया है, जिन्होंने देखा उन्होंने माना भी। इसके बावजूद वहां हिंसा का दौर चलता रहता है। न्यूज चैनल और अखबार हमें बता देते हैं कि कश्मीर में क्या हो रहा है? हम हमेशा एक पक्ष की कहानी सुनते आए हैं। अब एक किताब आई गर-फिरदौस। इसमें उस कश्मीर की कहानी है जिसे अभी तक किसी ने नहीं कहा। ये किताब बताती है कि कश्मीर जन्नत है लेकिन वहां के लोग उससे दूर हैं।


ऐसा भी नहीं है गर-फिरदौस में किसी का पक्ष रखा गया है, किसी की बात कही गई है। वो तो बस एक कहानी है जो अपना काम कर रही है। ये कहानी कश्मीरियत के होने की भी है। कुछ सालों में कश्मीर में बहुत कुछ घटा है। लेखिका ने उन्हीं घटनाओं को कहानी के रूप में बताया है। इस किताब को पढ़ने के बाद आप भी कश्मीर के गम में थोड़ा डूबेंगे और सोचने पर मजबूर हो जाएंगे।

लेखिका के बारे में

लेखिका प्रदीपिका सारस्वत।

इस किताब की लेखिका हैं प्रदीपिका सारस्वत। प्रदीपिका पेशे से पत्रकार हैं। मीडिया नौकरी छोड़कर अब वे फ्रीलांस राइटर बन गई हैं। कश्मीर को उन्होंने बहुत करीब से देखा है। वहीं से देश भर को वहां के हालात के बारे में बताती रही हैं। प्रदीपिका वैसे तो आगरा की हैं मगर वे घर पर रहती कम हैं। वे कहती भी हैं कि मैं घुमक्कड़ हूं। जहां होती हूं, वहीं की हो जाती हूं। मास कम्यूनिशेन की पढ़ाई की और डेस्क के पीछे बैठने वाले मीडिया में आ गईं। वहां टिक नहीं पाईं तो नौकरी छोड़ी और कश्मीर चली गईं। वहां कुछ महीने रहीं और फिर सबके सामने किताब लेकर आईं, प्रदीपिका सारस्वत।

किताब के बारे में


गर फिरदौस में एक कहानी है जिसके तीन मुख्य किरदार हैं, इकरा, शौकत और फिरदौस। किताब में इन्हीं के नाम से तीन अलग-अलग चैप्टर हैं। अपने चैप्टर में वे अपनी-अपनी कहानी बताते हैं, अपने-अपने कश्मीर को बताते हैं। इकरा एक काॅलेज में पढ़ने वाली लड़की है जिसे एक लड़का पसंद है। जिसे अपने दोस्तों के साथ रहना पसंद है, जो कुछ देखती है उसे अपने ब्रश से कोरे कागज पर उतारती है। जिसे शाम को डल झील के किनारे घूमना पसंद है। फिरदौस, एक पढ़ा-लिखा नौजवान है जो दिल्ली से पढ़कर आया है। उसने कश्मीर से बाहर के हिन्दुस्तान को देखा है। उसे घुटन महसूस होती है जब वो दोनों जगह अंतर पाता है। तीसरा किरदार है, शौकत। शौकत वो कश्मीरी है जो आतंकवादी और सेना के बीच पिस रहा है। वही डर उसके अंदर बना रहता है।

कहानी कुछ ऐसे शुरू होती है कि फिरदौस और इकरा अपने कुछ दोस्तों के साथ श्रीनगर जाते हैं। रास्ते में सेना फिरदौस को पकड़ ले जाती है और उसके बाद कहानी कश्मीर को बताती है। कभी इकरा के कश्मीर को दिखाया जाता है जिसे न कोई सही लगता है और न ही कुछ गलत। उस घटना के बाद फिरदौस की जिंदगी पूरी तरह से बदल जाती है। उसे अपनी पढ़ाई बेमानी लगने लगती है। शौकत कहानी में थोड़ी देर से आता है मगर बहुत जरूरी बातें बताता है। उसी के माध्यम से लेखिका कश्मीर में आतंकवाद और सेना को लेकर आती है। मुजाहिदीन क्या सोचते हैं? सेना इनका क्या करती है? ये सब किताब में पढ़ने को मिलता है।

गर फिरदौस सिर्फ कहानी नहीं है कि पढ़ा जाए और भूला दिया जाए। ये तो कश्मीर की कहानी है, वहां के लोगों की कहानी है। इसमें बताया गया है कि कोई कश्मीरी हथियार उठाता है तो क्यों उठाता है? किताब में बहुत अच्छी तरह से बताया गया है कि कश्मीर के लोग क्यों सेना से डरते हैं? किताब में एक जगह जिक्र भी है जब फिरदौस सोचता है कि बदन पर वर्दी और हाथों में बंदूक लिए लोग सबके लिए आम नहीं थे। डर और मौत के साये सिर्फ उसके ही मुल्क के हिस्से आए थे। ये एक ही देश के दो जगहों के बारे में बताता है। इसके अलावा पाकिस्तान से आने वाले लोगों के बारे में भी काफी कुछ कहा गया है। शौकत के किरदार इस कश्मीर से रूबरू कराता है। इसी के बारे में एक जगह शौकत सोचता है, परदेसी मुल्क में कोई आखिर क्यों अपना सब कुछ छोड़कर जान हथेली पर लिए इस तरह फिरेगा। जब ये सब पढ़ते हैं तो लगता है अब तक कश्मीर के बारे में कुछ और ही सुनते आए थे।


किताब में इसके अलावा कश्मीर की सुंदरता का खूब जिक्र है। इसमें सुंदरता के नाम पर सिर्फ डल झील, श्रीनगर और शिकारा नहीं है। इसके अलावा कश्मीरी पकवानों के बारे में भी बीच-बीच में जिक्र होता रहता है। उर्दू शब्द तो इतने ज्यादा हैं कि आपको हर लाइन में उर्दू शब्द मिल जाएंगे। किताब में सब बुरा ही बुरा नहीं है। गर फिरदौस बताती है कि कश्मीर बंद होने के बावजूद उनकी जिंदगी बंद नहीं हुई थी। इंटरनेट बंद होने के बाद भी उन्होंने लोगों से बात करना बंद नहीं किया था। हर वीकेंड पर साथ बैठकर दावत करना फिर भी नहीं भूले थे। कर्फ्यू के बीच भी प्रेमी, प्यार करना नहीं छोड़े थे। गर फिरदौस, उस कश्मीर की कहानी है जिसके बारे में कोई नहीं बताता। जहां जिंदगी तो सरपट से दौड़ रही है लेकिन बेबसी और चुभन भी है।

किताब की खूबी


गर फिरदौस की सबसे बड़ी खूबी तो उसकी कहानी का ढंग है। जिसमें सिर्फ कहानी नहीं, कश्मीर को भी कह दिया है। उसके बाद भाषा बहुत सरल है। उर्दू के बहुत शब्द हैं लेकिन इतने भी कठिन नहीं कि समझ में न आएं। पूरी किताब में सिर्फ तीन तस्वीरें हैं, जो आपको तीनों चैप्टर में मिल जाएंगी। शायद लेखिका ने उसे कश्मी में रहते हुए कैद किया होगा। कमियां तो आपको इसमे ढूढ़ने से भी नहीं मिलेंगी। हो सकता आपको लगे कि ये काल्पनिक भी हो सकता है। फिर भी नहीं भूलना चाहिए कि लेखिका एक पत्रकार हैं। ये कश्मीर का रिपोर्ताज है बस उन्होंने इसे कहा कहानी के ढंग में है। क्योंकिा घटनाएं भुला दी जाती हैं लेकिन किस्से और कहानी जेहन में बने रहते हैं। इस किताब को पढ़ने के बाद शौकत, इकरा और फिरदौस भी आपके जेहन में बना रहेगा।

गर फिरदौस डिजिटल संस्करण में है। इसे आप किंडल पर जाकर पढ़ सकते हैं। बहुत ज्यादा मोटी भी नहीं हो तो आप एक बैठक में ही इसे पढ़ डालेंगे। गर फिरदौस जैसी किताबें दिमाग को सोचने पर मजबूर करती हैं। मेरा विश्वास है कि किताब खत्म होने के बाद भी आप कश्मीर के बारे में सोचते रहेंगे। जिसके बाद शायद आप कश्मीर को कुछ अलग नजर से देखेंगे। किताब पढ़ने के बाद मुझे फिरदौस की एक बात याद रहती है, जो कश्मीर के लोगों की कहानी भी है। 

रोज मुर्दे की तरह जीने से एक दिन सचमुच का मर जाना बेहतर है। 

किताब- गर फिरदौस।
लेखिका- प्रदीपिका सारस्वत
प्रकाशन- एमेजाॅन किंडल।
कीमत- 29 रुपए।

Wednesday, 17 June 2020

इंडिया ऑफ्टर गांधीः आजादी के बाद के कुछ सालों की कहानी, जिसमें बहुत कुछ बना और बहुत कुछ बिगड़ा!

जैसे ही आखिरी ब्रिटिश सिपाही बंबई या कराची बंदरगाह से रवाना होगा। हिन्दुस्तान परस्पर विरोधी धार्मिक और नस्लीय समूहों के लोगों की लड़ाई का अखाड़ा बन जाएगा। 
                                      - जे. ई. वेल्डन, 1915।

इंडिया ऑफ्टर गांधी जिसका हिंदी अनुवाद भारत गांधी के बाद है। आजादी के बाद के भारत के इतिहास को बेहतरीन तरीके से बताया है। ऐसा लगता है कि हम किसी किताब की अलग-अलग कहानी पढ़ रहे हैं जो घूम-फिरके एक ही किरदार पर आकर ठहर जाती है, जवाहर लाल नेहरू। 1947 में नेहरू कैसे थे और 1964 में आते-आते क्या थे? इस किताब को पढ़ने के बाद समझ आता है। ये किताब दुनिया के विशालतम लोकतंत्र का सिर्फ इतिहास नहीं है। ये किताब आज की सरकार और राजनेताओं के लिए एक सबक भी है। उन्हें इस किताब से सीखना चाहिए कि जब संकट आए, समस्याएं आएं तो क्या नहीं करना है? हमारे सामने उस समय कुछ समस्याएं थीं, हमने तब क्या किया और क्या नहीं करना चाहिए था? दोनों ही बातें बताती है ये किताब।

लेखक के बारे में


रामचन्द्र गुहा।

रामचन्द्र गुहा देश के जाने-माने इतिहासकार हैं। वे देश के बड़े मुद्दों पर अपनी राय रखते हैं और लोग उनको सुनते हैं। उनका जन्म 1958 में देहरादून में हुआ। दिल्ली और कलकत्ता से पढ़ाई की। कई जगह प्रोफेसर भी रहे। दस साल तीन महाद्वीपों में पांच अकादमिक पदों पर रहने के बाद वे अब पूरी तरह से लेखक बन चुके हैं। उनकी लिखी किताबों को 20 भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। इस किताब के अलावा भारत नेहरू के बाद भी काफी चर्चित रही है। रामचन्द्र गुहा ने बैंगलोर को अपना ठिकाना बना लिया है। अब वे वहीं से लेखन का काम करते हैं।

क्या है किताब में


किताब में आजादी के समय से लेकर नेहरू के निधन तक ही कहानी है। उस दौरान जो भी बड़े और जरूरी मुद्दे, घटनाएं हुईं। वो सब इस किताब में है। किताब शुरू होती है एक प्रस्तावना से जिसकी कुछ पंक्तियों के बाद गालिब का एक शेर आता है। फिर हिन्दुस्तान के बारे में काफी कुछ बताया जाता है। जिसमें लेखक के खुद के विचार है। वो भारत को अस्वाभाविक राष्ट्र कहते हैं, इस प्रस्तावना में वे इसकी वजह भी बताते हैं। उसके बाद शुरू होती है किताब।

इंडिया आॅफ्टर गांधी में पहला चैप्टर है आजादी और  
राष्ट्रपिता की हत्या। आजादी के समय देश का क्या माहौल था? देश के आंदोलनकारी जो अब नेता बन चुके थे, वे क्या कर रहे थे? गांधी जी देश के अलग-अलग हिस्सों में जाकर शांति बहाल करने की कोशिश में लगे थे। आजादी मिली और उसके बाद देश की सबसे बड़ी त्रासदी हुई। जिसमें लाखों लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा, देश में हिंसा का माहौल था। उस दौर को लेखक ने आंकड़ों, बयान, संस्मरण से बताने की कोशिश की है। इसके अलावा किताब में विभाजन, 565 रियासतों को एक करना, कश्मीर समस्या, शरणार्थी, कुछ विकास की घटनाएं, आदिवासी समस्या, राज्यों का पुनर्गठन और चीन से युद्ध के बारे में विस्तार से बताया है।

किताब में 17 चैप्टर हैं। हर अध्याय में देश की एक कहानी है, एक समस्या है और उन पर लिए कुछ कदम हैं। जो पढ़ते हुए कभी सही लगता है तो कभी लगता है ये नहीं होना चाहिए। फिर चाहे केरल सरकार को बर्खास्त करना हो या आंध्र प्रदेश के शख्स का अनशन करते हुए मर जाना हो या फिर बात हो नेहरू का हमेशा वी के मेनन के पीछे खड़ा रहना हो। जिसका नतीजा निकला भारत का 1962 में चीन से पराजय का मुंह देखना पड़ा। देश के कई राज्य उसी 17 सालों में बने। वो कैसे बने? क्या समस्याएं आई? बंबई महाराष्ट्र का हो, गुजरात में जाए या अलग ही रहे? ये सब जानकारी ये किताब देती है।

हर चैप्टर की शुरूआत में ऐसे ही कथन हैं।

ये किताब कुल मिलाकर हमें जागरूक करती है। हमें वो सब जानकारी देती है। जिनके बारे में या तो बहुत कम पता है या पता ही नहीं है। मुझे नहीं पता था कि जवाहर लाल नेहरू ने अपने खास दोस्त शेख अब्दुल्ला को गिरफ्तार करवाया। मुझे नहीं पता था जब नेहरू की मौत हुई तो शेख फूट-फूटकर रो रहे थे। मुझे नहीं पता था कि चीन और भारत के बीच क्या बातें हुईं थी? ये किताब संविधान में बने कुछ प्रमुख कानूनों की भी बात करता है। जिनको लेकर संविधान सभा में बहुत बहस हुई। चाहे भाषा का मामला हो, अल्पसंख्यकों के अधिकार का मामला हो या झंडे पर विचार की बात हो। संविधान सभा के स्वरूप और उस समय दिए गए बहुत सारे कथनों को भी किताब में डाला गया है।

रामचन्द्र गुहा ने ये किताब बहुत रिसर्च के बाद लिखी है। जो पढ़ते हुए समझ में भी आता है। उन्होंने इसके लिए कितनी मेहनत की है, ये किताब के आखिर में संदर्भ देखने के बाद समझ आता है। 525 पेज की इस किताब के आखिरी 47 पेज में सिर्फ संदर्भ हैं। लेखक ने हर चैप्टर के अलग-अलग संदर्भ लिखे हैं। जो इस किताब को और भी विश्वसीन बनाता है। आप इस किताब को पढ़ने के बाद सिर्फ उस दौर के इतिहास, परिस्थितियों और घटनाओं को ही नहीं समझते। आपको समझ आता है भारत, आप खोज पाते हैं भारत। भारत को जानने और समझने के लिए एक मुकम्मल किताब है, भारत गांधी के बाद।

क्यों पढ़ें?


वैसे तो मुझे ये बताना नहीं चाहिए क्योंकि अब तक बहुत सारे लोग इसको पढ़ चुके हैं। इस किताब को कई अवाॅर्ड भी मिल चुके हैं। आउटलुक ने तो इसे बुक आॅफ द् ईयर से नवाजा है। फिर भी मुझे ये अच्छी लगी क्योंकि इसमें जानकारी बहुत है, वो भी रोचक तरीके से। पढ़ते हुए मैं कभी बोर नहीं हुआ। आगे पढ़ने की लालियत बनी ही रहती थी। ये किताब लेखक ने अंग्रेजी में लिखी। इसका हिन्दी अनुवाद सुशांत झा ने किया। मैंने ये किताब हिन्दी में ही पढ़ी। भाषा बिल्कुल सहज और सरल है। आपको पढ़ते हुए दिक्कत नहीं आएगी। लेखक ने किताब में कुछ ऐसे लोगों के बारे में बताया है। जिन्होंने बहुत जरूरी काम किए हैं लेकिन उनके बारे में बहुत कम लोगों को पता है।

किताब में बहुत कम चित्र हैं।

किताब में तस्वीरें बहुत कम हैं। लेखक ने पूरी किताब में तस्वीरें रखने की बजाय, कुछ पेज तस्वीरों के लिए छोड़ दिए हैं। ये तस्वीर उन लोगों की हैं जिनका किताब में जिक्र है। तस्वीरें सिर्फ लोगों की नहीं हैं कुछ घटनाओं की तस्वीरें है। तस्वरों के अलावा कुछ नक्शे भी किताब में दिए हुए हैं। किताब को एक और चीज रोचक बनाती है। हर चैप्टर की शुरूआत में किसी न किसी व्यक्ति का कथन है। जो उस चैप्टर के मुद्दे से संबंधित होता है। भारत गांधी के बाद मुझे काफी कुछ जानने को मिला। ये किताब ज्ञान का एक भंडार है जिसे हर किसी को पढ़ना चाहिए। ये उस दौर की समस्याओं को भी बताता है, हमारी कमियों को भी बताता है और हमने क्या किया वो भी। आखिर में किताब में दिए एक अमेरिकी पत्रकार की टिप्प्पणी, जो कछ हद तक सही है और कुछ हद तक गलत।

हमारे लिए हिन्दुस्तान का सिर्फ दो ही मतलब हैं, अकाल और जवाहर लाल नेहरू।

किताबः इंडिया ऑफ्टर गांधी।
लेखक- रामचन्द्र गुहा।
अनुवादक- सुशांत झा हिन्दी।
प्रकाशक- पेंगुइन बुक्स।
कीमत- 399 रुपए।


Thursday, 11 June 2020

वन लाइनर के अलावा मुसाफिर कैफे में मुसाफिर जैसा कुछ भी नहीं है

असल में किताबें दोस्त तब बनती हैं जब हम सालों बाद उन्हें पहली बार की तरह छूते हैं। किताबें खोलकर अपनी पुरानी अंडरलाइन्स को ढूंढ़-ढूंढ़कर छूने की कोशिश करते हैं। किसी को समझना हो तो उसकी शेल्फ में लगी किताबों को देख लेना चाहिए। किसी की आत्मा समझनी हो तो उन किताबों में लगी अंडरलाइन को पढ़ना चाहिए।

ऐसी गहरी और अच्छी बातें किताब को रोचक बनाती हैं। दिव्य प्रकाश दुबे इस काम को बहुत अच्छी तरह से करते हैं। उनकी हर किताब में ऐसी ही बातें मिल जाती हैं जिनको नोटडाउन करने का मन करता है। आज मैं जिस किताब के बारे में बात कर रहा हूं वो है, मुसाफिर कैफे।

लड़की देखने गए और वहां वो पहले से ही ...

किताब का नाम उसके बारे में काफी कुछ बता देता है। उसी को देखकर हम किताब को पढ़ने या न पढ़ने का मन बनाते हैं। मुसाफिर कैफे को मैंने उसके नाम से ही पसंद किया था। पूरी किताब में मुसाफिर खोजता रहा मगर मिला नहीं। मुसाफिर कैफे में एक कहानी है जो कुछ हद तक लव स्टोरी है और कुछ हद तक आज की जिंदगानी है। मुसाफिर कैफे में लेखक ने बहुत हद तक आज के नौजवानों की रग पकड़ने की कोशिश की है। शायद इसलिए ये किताब युवाओं को पसंद आई है।

लेखक के बारे में 

Divya Prakash Dubey (@divyapdubey) | Twitter                                                             
मुसाफिर कैफे को लिखा है दिव्य प्रकाश दुबे ने। दिव्य प्रकाश चार किताबें लिख चुके हैं। हाल ही में उनकी किताब अक्टूबर जंक्शन आई है। मुसाफिर कैफे उनकी तीसरी किताब है। इसके अलावा उनकी दो किताबें शर्तें लागू और मसाला चाय है। उनकी स्टोरीबाजी और संडे वाली चिट्ठी काफी पापुलर रही है। पढ़ने-लिखने में उन्होंने बीटेक और एमबीए किया है। 2017 में अपनी नौकरी छोड़कर पूरी तरह से लेखक बन चुके हैं। इन दिनों सोशल मीडिया पर लाइव करके लोगों से बात करते हैं। वहां अपना कुछ सुनाते हैं और दूसरों का सुनते भी हैं।


कहानी


ये कहानी है तीन नौजवानों की, सुधा, चंदर और पम्मी की। लेखक ने धर्मवीर भारती के उपन्यास गुनाहों के देवता के तीन मुख्य पात्रों को आज के समय में दिखाने की कोशिश की है। सुधा, चंदर और पम्मी के अपने सपने हैं और अपनी जिंदगी से कुछ अलग चाहते हैं। इसके बावजूद तीनों की जिंदगी एक-दूसरे से जुड़ी रहती है। ये कहानी कोई ट्राइंग्ल लव स्टोरी नहीं है कि कोई किसी को प्यार करता है तो कोई किसी से। सुधा वकील है जो तलाक दिलवाती है। जिससे उसका शादी से विश्वास उठ चुका है इसलिए वो शादी नहीं करना चाहती। चंदर थोड़ा कन्फ्यूज्ड है वो जिंदगी से क्या चाहता है? उसे खुद नहीं पता। पम्मी कहानी में थोड़ा देर से आती है। सुधा और चंदर की मुलाकात मुंबई के एक काॅफी हाउस में होती है। दोनों जल्दी दोस्त बनते हैं और फिर साथ रहने लगते हैं।

साथ रहते हुए चंदर को लगता है कि अब उसे शादी कर लेनी चाहिए जबकि सुधा का मानना है कि हम बिना शादी के भी साथ रह सकते हैं। चंदर मुंबई और सुधा को छोड़कर  निकल पड़ता है एक सफर पर। ये सफर उसे मसूरी पहुंचाता है। यहीं उसकी मुलाकात छोड़कर पम्मी से होती है। दोनों मिलकर मसूरी में ही कैफे खोलते हैं मुसाफिर कैफे। कहानी फिर सीधे दस साल आगे जंप करती है। उसके बाद सुधा और चंदर कैसे मिलते हैं। दोनों शादी करते हैं या नहीं, अगर करते हैं पम्मी का क्या होता है? ये सब जानने के लिए आपको मुसाफिर कैफे पढ़नी होगी।

किताब के बारे में


किताब में कहानी क्या है? उसको शाॅर्ट में बताने की कोशिश की है। किताब को इस प्रकार रोचक तरीके से लिखा गया है कि आप एक बार में पढ़ लेंगे। किसी किताब को अच्छा बनाती है कहानी के बीच की बातचीत। इस किताब में वो बातचीत पढ़ने में तो अच्छी लगती है लेकिन ऐसा बहुत कम होता है। वो सब फसाना-सा लगता है, खासकर सुधा और चंदर की बातचीत। पढ़ते हुए लगता है कि ऐसा सिर्फ मूवीज में हो सकता है वास्तव में नहीं। चाहे फिर वो दोस्त बनने की बात हो या फिर बिना शादी के हनीमून जाने की बात। हो सकता है कि बहुत-से लोगों को ये पसंद आया हो लेकिन ये मुझे किताब की सबसे बड़ी कमी लगी।

                                    मुसाफिर कैफे : दिव्य प्रकाश ने ...

किताब की भाषा बहुत सहज और सरल है। जिसे पढ़ने में आसानी होती है। इसके अलावा बहुत सारे वन लाइनर हैं और बहुत सारी ऐसी बातें हैं जिनको आप अंडरलाइन जरूर करना चाहेंगे। बीच-बीच में अंग्रेजी शब्द और अंग्रेजी भी है मगर वो खटकती नहीं है। इसके अलावा टाइटल भी अनोखे ढंगे से लिखे गए हैं जैसे कि ‘उ से उस दिन की बात’, ‘अ से अंडमान निकोबार’।

लेखक अपनी किताब को बहुत मेहनत से लिखता है। मगर पाठक को कैसी लगेगी? ये उसके हाथ मे नहीं होता है। दिव्य प्रकाश दुबे की अक्टूबर जंक्शन पढ़ने के बाद मुझे मुसाफिर कैफे थोड़ी कम पसंद आई। मुसाफिर कैफे मेरे लिए वो पहली किताब है जिसे मैंने किंडल पर पढ़ा। इसके बावजूद जिन्होंने ये किताब नहीं पढ़ी है उनको पढ़नी चाहिए। मगर ये सोचकर मत पढ़िए कि इसमें यात्रा और मुसाफिर जैसा कुछ होगा। 

सबकी मंजिल भटकना है, कहीं पहुंचना नहीं।

किताब- मुसाफिर कैफे।
लेखक- दिव्य प्रकाश दुबे।
प्रकाशक- हिन्दी युग्म और वेस्टलैंड लिमिटेड।
कीमत- 150 रुपए।
किंडल प्राइस- 115 रुपए।

Friday, 17 April 2020

जल थल मल: कुछ अहम मुद्दों पर सोचने को मजबूर करती है ये किताब

इस समय पूरी दुनिया में स्वच्छता पर बहुत ध्यान दिया जा रहा है। भारत में तो इस पर एक अभियान चल रहा है। जिसके तहत पूरे देश में शौचालय बनाए जा रहे हैं। शौचालय में लोग जा रहे हैं या नहीं जा रहे हैं वो अलग बात है। मगर सवाल ये है कि क्या शौचालय से स्वच्छता आएगी? ये शौचालय करते क्या हैं? हमारे मल को जल और मिट्टी तक ले जाते हैं। इससे तो हमारी नदियां, हमारा भूजल और हमारी जमीन को नुकसान हो रहा है। इसी मल का जल और थल के संबंधों, समस्याओं और इन्हीं के इर्द-गिर्द सवालों पर सोचने को मजबूर करती है सोपान जोशी की किताब ‘जल थल मल’।


जल थल मल में सिर्फ शौचालय की बात नहीं की गई है। इसमें विज्ञान, पर्यावरण, नदियां, भोजन के बारे में बहुत गहन तरीके से बताया गया है। सोपान जोशी उन अनदेखे पहलुओं के बारे में बताते हैं। जिनके बारे में हमें या तो पता नहीं है या फिर हम उस ओर ज्यादा ध्यान नहीं देते। इस किताब को सिर्फ पढ़ना ही नहीं चाहिए बल्कि इसके हर पहलुओं पर बात और चर्चाएं भी करनी चाहिए।

लेखक के बारे में

लेखक।

जल थल मल को लिखा है सोपान जोशी ने। सोपान जोशी का जन्म 1973 में मध्य प्रदेश के इंदौर में हुआ। दिल्ली में स्कूली शिक्षा पूरी की और 1996 में दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य से गे्रजुएशन किया। सोपान जोशी पेशे से पत्रकार हैं। पहले वो अखबारों और पत्रिकाओं में काम किया करते थे। खेती-किसानी, विज्ञान, पर्यावरण, जल प्रबंधन, खेल पर रिपोर्टिंग की है। अब दिल्ली में रहकर ही स्वतंत्र लेखन करते हैं। इस किताब के अलावा उनकी दो और किताबें हैं, एक था मोहन और बापू की पाती।


किताब के बारे में


सोपान जोशी ने अपनी इस किताब को 10 अध्यायों में बांटा है। हर अध्याय में अलग-अलग विषय पर बात होती है। किताब के पहले पन्ने पर भगवान बराह का सुअर रूपी चित्र बना हुआ है। आगे पढ़ते हुए इस बारे में समझमें आ जाता है। किताब का पहला अध्याय है ‘जल थल मल’। शुरू में लेखक इस सृष्टि के बनने और उसमें रहने वाले जीवों के बारे में बताते हैं। वे इस संसार के नियमों के बारे में बात करते हैं। प्रलय कैसे हुआ, मनुष्य की प्रजाति कैसे आई? इस बारे में पता चलता है। शुरू में पढ़ते हुए लगता है कि मैं कोई विज्ञान की किताब पढ़ रहा हूं। लेकिन जल्दी ही लेखक मूल विषय पर चर्चा करते हैं, मल। लेखक लिखते हैं, ’हमारी आबादी चौगुनी हुई है तो हमारा मल-मूत्र भी चौगुना बढ़ा है लेकिन उसके ठिकाने चौगुने नहीं हुए हैं।’

इस बारे में किताब में कई आंकड़े दिए जाते हैं जो बेहद भयावह हैं। जिन आधुनिक शौचालय का हम इस्तेमाल करते हैं वो जल प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण है। इस मल का विर्सजन कैसे किया जाए? कहां किया जाए? इस बारे में उदाहरण सहित बताती है ये किताब। इसमें लंदन की टैम्स नदी का उदाहरण है जो 1850 में नाला बन गई थी। इसके अलावा कोलकाता के भेरिया के बारे में बताते हैं जो शहर के गंदे पानी से मछली पालन करते हैं। सोपान जोशी बताते हैं कि सबसे ज्यादा मल कहीं पैदा होता है तो वो है, ट्रेन। मल और रेल का पूरा गणित समझाती है ये किताब। तब लगता है कि इस बारे में हमने तो कभी सोचा ही नहीं। सरकार शौचालय के लिए योजनाएं सालों से बनवा रही है। हर बार स्वच्छता के नाम पर बस उनके नाम बदल दिए जाते हैं। न तो इन सालों में शौचालय की पद्धति बदली और न ही उनका निकासी तंत्र।


किताब में बहुत सारे चित्र बने हुए हैं। जिनको उकेरा है सोमेश कुमार ने। इस वजह से किताब पढ़ते हुए उन चित्रों को घटनाओं और लेखक की बातों से जुड़ पाते हैं। ये चित्र किताब को और अधिक प्रभावी बनाते हैं। आगे बढ़ने पर किताब आधुनिकता वाले मल के एक बेहद चिंताजनक पहलू को बताती है। ये पहलू है उस प्रथा का जिसमें एक जाति विशेष के लोग मैला ढ़ोते हैं। दूसरे देशों में इसके लिए प्रशिक्षण और उपकरण दिए जाते हैं लेकिन हमारे देश में ऐसा कुछ नहीं है। किताब में ही ऐसी कई घटनाओं का जिक्र है जिसमें सीवर सफाई करते हुए लोगों की मौत हो गई। 1993 में इस प्रथा को बंद कर दिया गया था। किताब में एक जगह लेखक लिखते हैं कि देश भर में करीब सात लाख लोग हाथ से मैला ढो रहे हैं। लेखक ऐसा काम करने वाली जातियों और उनके इतिहास के बारे में भी बताते हैं।

शुचिता का विचार


लेखक किताब में बार-बार शुचिता का जिक्र करते हैं। शुचिता का अर्थ है पवित्र भाव। आगे किताब में नदी से हमारी दूरी के बारे में जिक्र है। हमने कैसे नदियों को नाला बना दिया और फिर उसे साफ करने के लिए सीवर तंत्र लगा दिए। इन सबकी खामियां और आलोचना करती है ये किताब। मैले पानी को कैसे साफ किया जाए? उसकी कुछ सफल पद्धतियों के बारे में भी बताती है ये किताब। हमारे मल और शौचालय ने कितनी की नदियों को पाट दिया है। इसमें इसमें दिल्ली की यमुना की सहायक नदियां, मुंबई की मिट्ठी जैसी तमाम नदियां हैं। पहले ये देश तालाबों और नदियों का देश कहलाया जाता था। लेखक कहता है कि आज पानी को सहेजने की प्रणाली ‘नाले’ बन चुकी हैं।


किताब में लिखा है कि पहले मल को सिर्फ नदियों में नहीं बहाया जाता था। मल को खाद के रूप में उपयोग किया जाता था। इतिहास के कई उदाहरण भी इसमें बताए गए हैं जिसमें लोग मल को खेती के लिए खरीदते हैं। गांव के लोग पहले इसलिए खेतों मल विर्सजन करने जाते थे। सोपान जोशी बताते है, मल को पहले सोने की उपमा दी जाती थी। हरित क्रांति आई तो ये मल खेतों की जगह नदियों में जाने लगा। लद्दाख में एक पद्धति है ‘छागरा’। जिससे मल खेतों के लिए आज भी इस्तेमाल किया जाता है। शौचालय कैसे होेने चाहिए? उस बारे में भी विस्तार से बताती है ये किताब। इसमें इतिहास के कई घटनाएं, विषयों के बारे में गहन चर्चा और उदाहरण से इसमें गहनता आती है।

क्या है खास?


ये किताब कई अहम मुद्दों पर लिखी गई है। जल प्रदूषण, मल तंत्र और थल के बारे में। इन तीन मुददों को लेकर किताब कई विषयों को समेटती है जिसमें नदियां, उद्योग, सीवर, खाद्य तंत्र, शौचालय और फसल आदि चीजें हैं। ये किताब इसलिए खास है क्योंकि एक जगह पर इतनी सारी बातों पर गहन अध्ययन मिलना मुश्किल है। इसमें एक और खास चीज है, संदर्भ। लेखक ने संदर्भ के लिए 20 पेज दिए हैं। हर अध्याय के लिए संदर्भ कहां से और कैसे लिया? इसको विस्तार से बताया है। इस प्रकार से संदर्भ बहुत कम किताबों में मिलते हैं। ऐसे ही संदर्भ मुझे अनुपम मिश्र की ‘आज भी खरे हैं तालाब’ में मिले थे।

किताब पढ़ने पर पता चलता है कि इसमें कितना रिसर्च की गई, लेखक ने कितनी स्टडी की है। जैसा कि मैंने शुरू में ही कहा कि आप ज्यों-ज्यों इसको पढ़ेंगे आप उसके बारे में सोचना शुरू कर देंगे। किताब में भाषा बिल्कुल सहज और सरल है। इसे पढ़ने में किसी भी प्रकार की समस्या नहीं होगी। इस किताब को देश के हर नागरिक को पढ़ना चाहिए। अगर हम इन विषयों के बारे में अच्छे से जान लेेंगे। उसके बाद शायद हम वो गलतियां न करें जो आज करते हैं।


जल थल मल की कीमत समझाती है ये किताब। ये सब कुछ आता है शुचिता के भाव से। लेखक कहता है कि शुचिता की परख हमारे सामाजिक संबंधों की पड़ताल है। शुचिता का काम आधुनिकता और परंपरा की थकी हुई बहस नहीं है। इसमें आधुनिकता भी होनी चाहिए और परंपरा भी। ये किताब पढ़ी जानी चाहिए क्योंकि ये शुचिता के पटल को खोलती है। इसको पढ़ा जाना चाहिए ताकि हम विवश को उस गंदगी के बारे में सोचने को। जो हमें जल थल मल के मोल को नहीं समझने दे रही है।

किताब- जल थल मल
लेखक- सोपान जोशी
कीमत- 278 रुपए
प्रकाशन- राजकमल प्रकाशन
कुल पृष्ठ- 208।

Thursday, 26 March 2020

सौंदर्य की नदी नर्मदाः अमृतलाल वेगड़ ने इस किताब से करा दी नर्मदा की यात्रा

यात्रा करना हर किसी को अच्छा लगता है लेकिन उसे ठीक वैसे ही शब्दों में बयां करना थोड़ा कठिन होता है। कई यात्रा वृतांत कलम की जादू की वजह से अच्छे लगते हैं तो कुछ अनुभव और किस्सों से। ऐसे ही कई मनोरंजक और छोटे-छोटे किस्से, कहानियों से अमृतलाल वेगड़ की किताब मुझे पसंद आई। कहते हैं कि अच्छी किताब वो है जो एक ही बार में पढ़ ली गई हो। वो अच्छी किताब हो सकती है लेकिन कुछ किताबों को पढ़ते हुए लगता है कि इसे आराम-आराम से पढ़ा जाए। ‘सौंदर्य की नदी नर्मदा’ ऐसी ही एक किताब है।


‘सौंदर्य की नदी नर्मदा’, अमृतलाल वेगड़ की नर्मदा यात्रा का अनुभव है। नर्मदा, भारत की पांचवी सबसे बड़ी नदी है। इसे मध्य प्रदेश की जीवन रेखा भी कहा जाता है। नर्मदा अमरकंटक से अरब सागर तक 1,312 किमी. की यात्रा करती है। अमृतलाल वेगड़ ने भी नर्मदा के किनारे-किनारे पैदल यात्रा की। उन्होंने ये यात्रा एक ही बार में पूरी नहीं की। उन्होंने नर्मदा यात्रा 1977 से 1987 के बीच में की। उस यात्रा को और उसके अनुभव को अमृतलाल वेगड़ ने अपनी किताब में समेटा है।

लेखक के बारे में

लेखक अर्मतलाल वेगड़।

अमृतलाल वेगड़ अच्छे साहित्यकार और चित्रकार रहे। वे मध्य प्रदेश के जबलपुर के रहने वाले थे। उन्होंने नर्मदा संरक्षण के लिए आवाज उठाई। 47 साल की उम्र से उन्होंने नर्मदा की यात्रा शुरू की और 2009 तक करते रहे। उन्होंने नर्मदा की कई बार यात्रा की और उसके बारे में पूरी दुनिया को बताया। सौंदर्य की नदी नर्मदा के लिए उन्हें 2004 में साहित्य अकादमी पुरस्कार भी दिया गया। इस किताब के अलावा उन्होंने नर्मदा पर ही दो किताबें ‘अमृतस्य नर्मदा’ और ‘तीरे-तीरे नर्मदा’ लिखी है। 6 जुलाई 2008 को उनका देहांत हो गया।


किताब के बारे में


लेखक अपनी यात्रा शुरू करता है अपने घर जबलपुर से। लेखक शुरू में अपने जाने की वजह और साथियों के बारे में बताता है। पूरी यात्रा में हर बार लेखक के साथी बदलते रहते हैं। नर्मदा के किनारे-किनारे पैदल यात्रा करते हैं। वो नर्मदा के गांवों, आसपास के इलाके और लोगों के बारे में बताते जाते हैं। अपने अनुभवों को भी लेखक अच्छे से बताता है। पढ़ते हुए लगता है कि हम भी लेखक के साथ नर्मदा यात्रा पर निकल गए हैं। नर्मदा के बारे में लेखक बहुत कुछ बताते हैं। वो कहते हैं, गंगा श्रेष्ठ है लेकिन ज्येष्ठ नर्मदा है। नर्मदा, गंगा से पहले की है और लाखों लोगों की जीवन रेखा है।

इस किताब को पढ़ते हुए आपको नर्मदा के स्वरूप को समझ में आएगा। नर्मदा, किस जगह कैसी है, उसकी सहायक नदियों का स्वरूप क्या है? गर्मियों में नर्मदा कैसी बहती है और जब सूख जाती है तब कैसी उजाड़ लगती है। नर्मदा के बारे में सब कुछ किताब को पढ़ते हुए समझ में आता है। उस समय गांव कैसे होते थे, वहां का परिवेश और लोगों के बारे में बताते हैं। बीच-बीच लोगों से हुई बातचीत को डालकर इसे और अच्छा बनाते है। इस किताब से ही पता चलता है 80 के दशक में गांव के लोग स्टोव देखकर कितने खुश होते थे। आज तो हमारी जिंदगी से स्टोव पूरी तरह से गायब हो चुका है।

लेखक की यात्रा का पूरा रूट।

नर्मदा की यात्रा बढ़ती जाती है लेखक नई जानकारी देता रहता है। कभी झाड़ी में रहने वाले भीलों के बारे में, जो वहां आने वाले लोगों को पूरी तरह लूट लेते। शरीर से सारे कपड़े तक उतार लेते। तब लगता कि भील उस जमाने के चोर हैं लेकिन आगे जाकर उनकी भुखमरी और गरीबी को देखकर दुख होता। इसके अलावा नर्मदा अपने वाले डैम के बारे में भी बताते। जो आसपास के इलाके को डुबा देगा। अमृतलाल वेगड़ कहते हैं, ’आज जैसी नर्मदा मैं देख रहा हूं, जिस रास्ते पर मैं चल रहा हूं। कुछ सालों बाद इन पर कोई नहीं चल पाएगा। यहां दूर-दूर तक पानी होगा’। बातचीत में लेखक को गांव वाले डैम से होने वाले नुकसान के बारे में भी बताते हैं। हालांकि लेखक डैम का बनाना अच्छा मानते हैं।

लेखक एक बार में जहां तक की यात्रा करता, अगली बार वहीं से शुरू करता। ऐसे में उसने नर्मदा को अलग-अलग साल और अलग-अलग महीनों में देखा। नर्मदा कैसे बढ़ती है और कैसे बदल जाती है लेखक ने अच्छी तरह से वर्णन किया है। नर्मदा पहाड़ और मैदान दोनों से होकर गुजरती है। लेखक ने जिस कुशलता से नदी के बारे में बताते चले हैं वो वाकई बेहतरीन है। मैंने कभी नदियों के किनारे-किनारे यात्रा नहीं की लेकिन इस किताब को पढ़ने के बाद ऐसी ही किसी यात्रा पर जाने का मन करता है।

जैसे-जैसे नर्मदा मध्य प्रदेश छोड़कर गुजरात पहुंचती है तो पढ़ने में और मजा आने लगता है। नर्मदा का उद्गम है मध्य प्रदेश के अमरकंटक में और समुद्र में मिलने से पहले आखिरी पड़ाव है, गुजरात का विमलेश्वर गांव। समुद की झलक, अमरकंटक का उद्गम, ओंकरेश्वर का मन मोहने वाला नजारा, ये सब पढ़कर लगता है नर्मदा की यात्रा करनी चाहिए। नदी के बारे में अमृतलाल वेगड़ किताब में लिखते हैं, ‘नदी है- जन्मजात यात्री। जन्म लेते ही चल पड़ती है और एक बार जो चली तो एक क्षण के लिए भी नहीं रूकती।’ इसके अलावा हर चैप्टर के पीछे उनका स्केच बना है। जो उन्होंने अपनी नर्मदा यात्रा में बनाया था। उन्होंने ये यात्रा किन मुश्किलों का सामना करते हुए की? खाना कैसे खाते थे? ठहरते कहां थे? ये सब आपको इस किताब में पढ़ते हुए आनंद आएगा।

सौंदर्य की नदी नर्मदा।

किताब से कुछ


पुजारी जी से खूब बातें होती हैं। नवागाम बांध की बात चली तो कहने लगे, ‘बांध के बन जाने पर सबसे पहले डूबेगा शूलपाणेश्वर मंदिर। शूलपाण की पूरी झाड़ी डूब जाएगी।’ जाने-अनजाने में मेरे मन मे यह बात है कि इस सुंदर, एकांत स्थान में जितना हो सके, रह लो। जी भरकर देख लो। पन्द्रह वर्ष के बाद तो इसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। शायद इसलिए चार दिन से मैं यहां घूम रहा हूं।

किताब की खूबी और कमी


किताब की सबसे बड़ी खूबी तो ये यात्रा है जो लेखक ने पैदल की। उसे जिस तरह से बताया है वो भी काफी रोचक है। इसमें जो जानकारी हैं, भीलों क बारे में , बैगा स्त्रियों के बारे में, उस समय के रीति-रिवाजों के बारे में, ये सब इस किताब को और रोचक बनाते हैं। इसके अलावा नर्मदा यात्रा के लिए ये किताब एक नक्शे की तरह है हालांकि डैम बनने के बाद इसमें काफी कुछ बदलाव आ गया है। अगर आप घुमक्कड़ हैं तो आपको इसे जरूर पढ़ना चाहिए। अगर आप नहीं घूमते हैं तो इस किताब से आप नर्मदा यात्रा कर सकते हैं।

इस किताब में मुझे कमी तो नहीं लगी लेकिन भाषा पूरी तरह से साहित्यक है। शायद जिस समय ये यात्रा हुई तब ऐसे ही बोलचाल हो। ये भी हो सकता है कि पहले किताबों की भाषा साहित्यक होती थी। इसी वजह से कुछ-कुछ शब्दों का अर्थ पता ही नहीं होता है। जिसे समझने में थोड़ी मुश्किल आती है। ऐसे यात्रा वृतांत आज के समय में नहीं लिखे जाते। तब के यात्रा वृतांत की भाषा और आज के यात्रा वृतांत की भाषा में आया बदलाव इस किताब को पढ़कर समझ सकते हैं।

इस किताब को पढ़ने के बाद सच में समझ में आता है कि नर्मदा, सौंदर्य की नदी है। अमृतलाल वेगड़ ने इस किताब से हमें अपनी यात्रा के बारे में नहीं बताया। इससे हमने नर्मदा को समझा, नर्मदा के किनारे रहने वाले लोगों के जीवन के बारे में पता चला। किताब इतनी अच्छी तरह से लिखी गई है लेखक के साथ पाठक भी नर्मदा की यात्रा कर लेता है।

किताब- सौंदर्य की नदी नर्मदा,
लेखक- अर्मतलाल वेगड़,
प्रकाशन- पेंगुइन बुक्स,
कुल पेज- 176,
लागत- 199 रुपए।

Wednesday, 12 February 2020

आधार से किसका उद्धारः आधार से सुधार नहीं हुआ है नुकसान, यही बताती है ये किताब

सरकार जब कोई योजना लाती है तो उसे जनकल्याण बताकर लाती है। हो सकता है बाद में उसका कल्याण किसी और का हो। ऐसी ही एक योजना है जिसे हम सब ‘आधार’ के नाम से जानते हैं। जब इसे लाया गया तो इसके बारे में कहा गया कि इससे उन लोगों को फायदा मिलेगा, जिनके पास पहचान पत्र नहीं है। समय बीतता गया और आधार का मकसद भी। आधार बनाया तो गया तो लोगों का उद्धार करने के लिए। लेकिन इसने कई समस्याओं को खड़ा कर दिया और कई सवालों को जन्म दिया। आधार, उसकी खामियां और उससे पैदा हुई समस्याओं के बारे में विस्तार से बताती है ये किताब ‘आधार से किसका उद्धार’।



यूपीए-2 के समय यानी कि 2009 में सरकार ने भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण यानी कि यूआईडीएआई का गठन किया। इसका मुख्य उद्देश्य लोगों को एक आईडी नबंर देना था। जो नंबर आधार कार्ड के रूप में आया और वो आधार प्रोजेक्ट बन गया। इस पहचान को देने के लिए बायोमैट्रिक सत्यापन कराया गया। जिसमें आपको अपनी कुछ जानकारी देनी होती है। इसके अलावा फोटो, उंगलियों के निशान और आंखों की रेटिना के छाप देने होते हैं। इसको सरकार ने एक व्यक्ति से लोगों के बीच फैलाया, नाम- नंदन नीलेकणी। 2015 तक बिना किसी कानून के आधार लोगों तक पहुंचाया दिया गया। जब इस पर सवाल उठने लगे तो 2015 में इसे बिल बनाने की बात कही गई। लेकिन बीजेपी सरकार के पास बहुमत नहीं था इसलिए इसे मनी बिल से पास किया गया। इस पर 2018 में सुप्रीम कोर्ट का एक बड़ा फैसला आया। जिसने आधार परियोजना को वैधानिक बताया।

लेखक के बारे में

लेखिका।

आधार पर इस शानदार किताब की लेखिका हैं, रीतिका खेड़ा। रीतिका खेड़ा इस समय आई.आई.एम. अहमदाबाद में इकाॅनाॅमिक्स और पब्लिक सिस्टम ग्रुप की सहायक प्रोफेसर हैं। रीतिका ने दिल्ली स्कूल ऑफ इकाॅनाॅमिक्स से पी.एच.डी. की है और सात सालों तक आई.आई.टी. दिल्ली में अध्यापन कर चुकी है। रीतिका के शोधकार्य ने भारत की अनेक नीतियों पर बहस को जन्म दिया। रीतिका कई अखबारों, मैग्जीन और बेबसाइटों के लिए लेख लिखती रहती हैं।

किताब एक नजर में


किताब शुरू होती है अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज की प्रस्तावना से। जिसमें वो आधार के मकसद को बताते हैं। उसके स्वैच्छिक से अनिवार्य होने की कहानी को बताते हैं। आधार की समस्याओं और इस किताब के बारे में कुछ अच्छी बातें बताते हैं। वो इस किताब के बारे में लिखते हैं, ‘इस विचोरोत्तेजक पुस्तक में उनके लेखों के पढ़ने पर आप खुद महसूस करेंगे कि आपने एक संग्रहणीय पुस्तक हाथ में उठाई है’। इस किताब में रीतिका खेड़ा के कई लेख हैं जो उनके मीडिया में छपे हैं। जो 2012 से मार्च 2019 के बीच के हैं। आधार किसलिए आया था? उसका मकसद क्या था? उसे लोगों के बीच कैसे पहुंचाया? ये सब आपको शुरूआत में पढ़ने को मिल जाएगा।

आप जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं आपको आधार का वो स्याह पक्ष पता चलता है जो सरकार जनता से दूर रखती है। आधार इसलिए बनाया गया था ताकि लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिले, बिचौलिये खत्म हों, भ्रष्टाचार खत्म हो। ऐसा तो कुछ हुआ नहीं लेकिन कई सारी समस्याएं लोगों के सामने आ गईं। कई राज्यों में लोगों को राशन नहीं मिला क्योंकि उनका राशन काॅर्ड आधार से लिंक नहीं था। जिनका आधार लिंक था कई बार उनको भी दिक्कतों का सामना करना पड़ता। इस वजह से कई लोगों की मौत भी हुई। तथ्य, कहानियां और आंकड़े सभी आपको इस किताब में मिल जाएंगे।



रीतिका इस किताब में लिखती है आधार हमेशा-से स्वैच्छिक था लेकिन उसे इस तरह प्रसार किया गया कि आधार बहुत जरूरी है। अगर आपके पास आधार नहीं है तो आपका जीवन मुश्किल में पड़ जाएगा। कई उदाहरण ऐसे हैं जो बताते हैं कि आधार आने से लोगों का जीवन खराब ही हुआ। पहले एक बुजुर्ग का पैसा डाकिया गांव देने आता था। अब उसे बैंक जाना पड़ता है और अगर बायोमैट्रक सही काम नहीं की तो उसे खाली हाथ वापस लौटना पड़ता है। रीतिका बताती है आधार आने से न भ्रष्टाचार कम हुआ और न ही बिचौलिये लिए भागे। अगर कुछ हुआ तो डाटा को जुटाया गया। आधार प्रोजेक्ट से सरकार के पास हर किसी की प्रोफाइल है। अब वो हर व्यक्ति के बारे में पूरी जानकारी जानता है। आप क्या खा रहे हैं? कहां जा रहे हैं? किस से बात कर रहे हैं? पैसों का लेन-देन। सब कुछ आपने सरकार को आधार के जरिये बता दिया है। क्या ये निजता का हनन नहीं है? क्या ये हमारी जिंदगी में तांक-झांक नहीं हैं।

डेटा क्या कर सकता है? इस बारे में रीतिका दो शख्स का जिक्र इस किताब में करती हैं, एडवर्ड स्नोडेन और क्रिस वाइली। इन दो लोगों ने अलग-अलग समय पर लोगों को बताया कि कैसे निजी जानकारी का इस्तेमाल किया जा सकता है? वो आशंका जाहिर करती हैं कि आधार से हमारा डाटा बहुत बड़ा हो गया है और इसका उपयोग किया जा रहा है। वो बताती हैं कि कंपनियां इसका उपयोग कर रही हैं, वे एयरटेल पेमेंट्स का उदाहरण देती हैं। रीतिका किताब में बार-बार इस बात पर जोर देती हैं कि लगातार दस सालों से सरकार हमें बता रही है कि आधार जीने के लिए, गरीबों तक हक पहुंचाने के लिए जरूरी है। जिस मकसद का हवाला देकर सरकार इसे लाई थी, वो आधार के बिना भी हो सकता है। वो छत्तीसगढ़ और झारखंड का उदाहरण इस बारे में देती हैं। कुल मिलाकर किताब में साफ-साफ लिखा है कि आधार से लोगों का उद्धार तो बिल्कुल भी नहीं हुआ है।

क्यों पढ़ें इसे?


आधार से आजकल हर कोई जुड़ा हुआ है। उससे क्या नुकसान है? उससे क्या समस्या आ रही हैं? वो हमारी निजता का हनन कैसे है? ये सब जानने के लिए आपको ये किताब जरूर पढ़नी चाहिए। तथ्यों और आंकड़ों से भरी पड़ी है ये किताब। जानकारी के लिए, जागरूकता के लिए आपको इस किताब को पढ़ना चाहिए। आप ज्यों-ज्यों इस किताब को पढ़ेंगे, आपके मन में कई सवाल आएंगे। आप आधार के बारे में सोचना शुरू कर देंगे और शायद यही तो उद्देश्य है इस किताब का। किताब में अगर मैं खामी की बात करूं तो सिर्फ बर्तनी ही बहुत कम जगह पर गड़बड़ है। इतनी महत्वपूर्ण जानकारी वाली किताब में ऐसी त्रुटियों को अनदेखा किया जा सकता है।



आखिर में बस इतना ही कहना चाहूंगा कि आधार पर रीतिका खेड़ा ने बेहतरीन किताब लिखी है। ये किताब आधार की पूरी कहानी को बताती है। उसके आर्थिक, तकनीकी और सामाजिक पक्षों के बारे में भी बताती है। रीतिका इस किताब में बताती है कि आप आधार के बारे में सोचती भी नहीं अगर उनके पास 2010 में आधार के ही दो अधिकारी नहीं आते। अगर आप आधार को सुधार समझते हैं तो आपको जानना चाहिए कि आधार से किसका उद्धार हुआ है।

किताब- आधार से किसका उद्धार
लेखिका- रीतिका खेड़ा
प्रकाशक- सार्थक राजकमल प्रकाशन का उपक्रम
कीमत- 125 रुपए।

Wednesday, 9 October 2019

आज भी खरे हैं तालाबः तालाब और पानी को समझाने वाला खजाना

‘कुछ बातें बार-बार कहनी पड़ती हैं, उन बातों में पानी एक है।’ ये पंक्ति इस किताब की नहीं है लेकिन इसे लिखने वाले नेे ये 
बात कही है। लेखक ने सही ही कहा है, हम पानी की बात ही कहां करते हैं? बड़े शहरों में तो पानी की चर्चा सिर्फ कुछ दिवसों तक ही सीमित रहती है। हम नहीं सोचते कि आखिर हम पानी के उपभोक्ता कब से बन गए? हमारे पास इस बात का भी सोचने का समय नहीं है कि ये स्थिति कैसे और कब बनी? हालात जैसे बनते गए, हम उसके आदी होते गए। आपके इन न पूछे जाने वाले सवालों का जवाब देती ये किताब।

आज भी खरे हैं तालाब।

पानी के गणित को समझने के लिए, पानी को समझने के लिए, हमारे पुराने और बेहतरीन समाज को जानने का एक बेहतरीन दस्तावेज है ये किताब। ‘आज भी खरे हैं तालाब’ पुस्तक में आपको तालाब के बारे में जानकारी मिलेगी। भारत में कभी 24 लाख तालाब थे और आज सिर्फ 2 लाख बचे हैं। इनके बनने और खत्म होने के बारे में किताब में अच्छी तरह से दिया गया है। अगर आपको तालाब और उसकी पद्धति को बहुत अच्छी तरह से समझना है तो इस किताब से बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता।

लेखक के बारे में 


पानी के बारे में इस शानदार किताब को लिखा है अनुपम मिश्र ने। कहा जाता है कि अनुपम मिश्र को जानना है तो ‘आज भी खरे हैं तालाब’ पढ़ लीजिए। अनुपम मिश्र जीवन भर पर्यावरण के लिए काम करते रहे। उन्होंने जमीन पर रहकर पानी का काम करने वाले लोगों को करीब से देखा है। उन्होंने राजस्थान के अलवर में जल संरक्षण का काम शुरू किया। उसके बाद उत्तराखंड में भी ऐसा ही कुछ किया।

अनुपम मिश्र।

अनुपम मिश्र का जन्म 1948 में महाराष्ट्र के वर्धा में हुआ था। बहुत कम लोगों को पता है अनुपम मिश्र हिन्दी के प्रसिद्ध कवि भवानी प्रसाद मिश्र के बेटे हैं। अनुपम मिश्र ने चिपको आंदोलन में जंगलों को बचाने में मदद की थी। इस किताब के लिए अनुपम मिश्र को 2011 में जमनालाल बजाज पुरस्कार से सम्मानित किया। आज भी तालाब हैं खरे 19 भाषाओं में अनुवादित हो चुकी है। 2009 तक इस किताब की 1 लाख से ज्यादा प्रतियां बिक चुुकी थीं। गांधीजी की ‘माय एक्सपेरिमेंट्स विथ ट्रुथ’ के बाद सिर्फ यही बुक ब्रेल लिपि में उपलब्ध है। अनुपम मिश्र का निधन 19 दिसंबर 2016 को हुआ था। अनुपम मिश्र ने इस किताब के अलावा 17 छोटी-बड़ी किताबें लिखी हैं। जिनमें से कुछ बहुत फेमस हैं, ‘साफ माथे का समाज’ और ‘राजस्थान की रजत बूंदें’।

आज भी खरे हैं तालाबः किताब की नजर से


किताब शुरू होती है एक कहानी से। कहानी जिसमें पारस है किसान है और एक राजा है। इस कहानी का अंत होता है राजा के एक वाक्य से, ‘जाओ! अच्छे-अच्छे काम करते जाना और तालाब बनाते जाना। बस तभी एक हर गांव में तालाबों की परंपरा हो गई। जहां तालाब होते, वहीं गांव बसे रहते। गांव के नाम इन्हीं तालाबों के नाम पर पड़ा करते थे। तालाब पहले पूरे भारत की धड़कन हुआ करते थे। इन्हें सिर्फ राजा नहीं लोग बनाया करते थे। सिर्फ बनाया नहीं करते थे, उनकी रक्षा भी करते थे। पहले अगर कुछ करना होता था तो तालाब बनाया जाता था। तालाब बनवाता एक था और सहयोग पूरा समाज करता था। तालाब बनना एक त्यौहार होता था। जिसे गांव के लोग साथ मिलकर मनाते थे। इस किताब में तालाब बनाने की देसी पद्धति बताई गई है। वो कहानी की तरह बताई गई है, जिसे पढ़कर आपको वहां होने का एहसास होगा। तालाब की जगह और दिशा को बड़े जतन से चुना जाता है। तालाब की इस विधि में आगौर, पाल, बाड़, गरट, गौरा, नेष्टा बनाने होते हैं। इन सबके बारे में अच्छे से समझाती है ये किताब। इस किताब को पढ़कर आप एक अच्छा तालाब बना सकते हैं।


सैकड़ों, हजारों और लाखों तालाब ऐसे ही अचानक प्रकट नहीं हुए थे। इसे बनाने वाले भी कुछ लोग थे और इसको संभालने वाले भी। देश के अलग-अलग हिस्सों में इनके अलग-अलग नाम थे। लेकिन कुछ सालों में हमने ऐसे लोगों को खो दिया और हम हजारों, लाखों तालाबों को शून्य की ओर ले जा रहे हैं। ये किताब बताती है कि पहले का समाज भी बहुत अच्छा था। तालाब को बनाने वाले और संभालने वालों का बहुत सम्मान हुआ करता था। वैसा ही जैसा आज डाॅक्टर का हुआ करता था। इन लोगों को आदर के रूप में उपहार भी मिलते थे। तालाब बनाने वाले ये लोग हिंदू और मुसलमान दोनों हुआ करते थे। इन लोगों का एक समुदाय हुआ करता था। जहां वो रहते थे, उस जगह का नाम भी वही पड़ जाता था। ये लोग बहुत सालों तक बने रहे क्योंकि ये लोग अपने शिष्यों को भी यही काम सिखाते थे। ये तालाब बनाने वाले कुछ नाम थे, गजधर, सिलावटा, जोड़िया, सिरभाव, जलसूंघा, पथरोट और टकारी। ये नाम अलग-अलग क्षेत्रों में बदलते गए। जैसे आज धन स्वाभिमान का प्रतीक है, पहले तालाब स्वाभिमान का प्रतीक हुआ करता था। तालाब रहते तो गांव रहता और तालाब सूखते तो गांव उजड़ जाते। तालाब में हर साल पानी आता है और हर साल जाता है। बस उसे बचाने का तरीका आना चाहिए। उसे तस्करी से बचाना आना चाहिए, ये तस्करी लोग नहीं सूरज करता है।

इस किताब में कई लोगों के बारे में भी बताया गया है, जो तालाब को अकेले बचाने का काम करते थे। ऐसे ही ‘गैंगजी’ के बारे में इस किताब में वर्णन दिया गया है। वे तालाब की रक्षक बने और लोगों ने उन्हें इसी वजह से संत बना दिया। पहले सिर्फ तालाब बनाया नहीं जाता था, उसकी बार-बार सफाई की जाती है। तालाबों से आज समाज कटने की सबसे बड़ी समस्या रख रखाव है। प्रशासन सफाई की जगह पर नया तालाब बनाने की बात करती है। लेकिन वो नहीं समझते कि पुराने तालाब कितने कामगर होते हैं। तब तालाब थे क्योंकि समाज अच्छा था। तालाब के या समुदाय के नाम पर उस जगह का नाम रखा जाता था। लेकिन ये किताब ये बताती है कि अलअलग तालाबों के अपने-अपने गुण होते हैं और उन्हीं गुणों के आधार पर तालाबों के नाम रखे जाते थे। सागर, सरोवर, सर, जोहड़-जोहड़ी, बंध-बंधिया, ताल-तलैया, पोखर-पोखरी, पुष्करणी, डिग्गी, कुंड, हौज, ताल, चाल, खाल और चौखरा। ये सभी नाम तालाबों अपने-अपने कुछ गुणों की वजह से रखे गए हैं। इस किताब में राजस्थान के घड़सीसर तालाब के बारे में दिया गया है। लेखक ने इसके बारे में खूब विस्तार से लिखा है।


किताब में गुणों, समाज, आकार और धर्म के लिए तालाब बनाने के बारे में भी जिक्र है। छत्तीसगढ़ में छेरा-छेरा त्यौहार तालाब के लिए ही मनाया जाता है। इसी तरह बुंदेलखंड में भी पूने के दिन हजार सालों तक नया तालाब बनते रहे। इस तरह राजस्थान में नवरात्र के आखिरी दिन तालाब  पर जुटते हैं। जिससे पता चलता कि इस बार उनके तालाब में कितना पानी आया है? हम आज तालाब को नहीं जानते उसकी गलती हमारी तो है ही, अंग्रेजों की भी। समाज से तालाब को दूर किया अंग्रेजों ने। हम तालाब से दूर होते गए और तालाब खत्म हो गए। गजधर आज होते तो बताते कि हम संकट के समय से गुजर रहे हैं। अब तालाब से हमारी दूरी उतनी ही है, जितनी जमीन और आसमां की। अब तालाब से समाज भी दूर है और राज भी। पानी के इस संकट से बचने के लिए हमें फिर से साफ माथे का समाज बनना होगा। तभी कह पाओगे आज भी खरे हैं तालाब। वरना ये किताब सिर्फ एक दस्तावेज है, जिसे बस एक बार आंख भर के देख लिया गया है।

क्या-क्या अच्छा?


ये किताब रोचक और दुर्लभ जानकारी से भरी हुई है। लेखनी बेहद सरल और सहज है। बिल्कुल सरल शब्दों में लिखा गया है और लिखे को बहुत अच्छे तरीके से समझाया गया है। कभी उदाहरण के रूप में तो कभी कहानी के रूप में। आपको पढ़ते समय कभी भी बोर नहीं होंगे। पानी, समाज और तालाब के बारे में बहुत सारे किस्से, कहानी और भी ज्यादा खास बना देते हैं। हो सकता है कि आप तालाब बनाने की विधि भूल सकते हैं, लेकिन उसका किस्सा जरूर याद रहेगा। इस किताब को एक चीज और रोचक बनाती है, संदर्भ। लेखक ने संदर्भों के बारे में विस्तार से बताया है। किताब के लिए क्या लिया, कहां से लिया और कैसे  लिया, इन सबके बारे में बताया गया है।  किस विषयवस्तु के लिए किस शख्स से बात की, ये भी अच्छे से बताया गया है।

किताब का एक अंश।

अनुपम मिश्र की ये किताब एक खजाना है, आज के संकट से उबरने के लिए। अनुपम मिश्र की ये किताब बूंदों, तालाब के महत्व और हमारी बेवकूफी के बारे में बताती है। इसे सुधारा भी जा सकता है, फिर भी अगर हम नहीं सुधरे तो इसके हालात बहुत बुरे होंगे। अनुपम मिश्र के शब्दों में कहूं तो, हमारे बड़े लोग जीडीपी, विकास, अर्थव्यवस्था पर बहुत चिंता करते हैं। अगर पानी पर ध्यान नहीं दिया तो इन पर कभी भी पानी फिर सकता है। आखिर में तालाब के बारे में इस किताब में ‘सीता बावड़ी’ के नाम की कविताः

बीचों बीच है एक बिंदु,
जो जीवन का प्रतीक है,
मुख्य आयत के भीतर लहरे हैं,
बाहर हैं सीढ़ियां।
चारों कानों पर फूल हैं,
जो जीवन को सुगंध से भर देते हैं।
पानी पर आधारित
एक पूरे जीवन दर्शन को
इतने सरल सरस ढंग से
आठ-दस रेखाओं में
उतार पाना एक कठिन काम है।
लेकिन हमारे समाज का बड़ा हिस्सा
बहुत सहजता के साथ
इस बावड़ी को
गुदने की तरह
अपने तन पर उकेरता है।

किताब- आज भी खरे हैं तालाब।
लेखक- अनुपम मिश्र।
प्रकाशक- प्रभात पैपरबैक्स।
कीमत- 125 रुपए।

इस किताब को इस लिंक पर जाकर खरीद सकते हैंः-

आज भी खरे हैं तालाब।