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Thursday, 31 January 2019

सत्य व्यास का ‘दिल्ली दरबार’, प्रेम और शाॅर्टकट से पटा पड़ा है

प्रेम को इस दुनिया की सबसे बेहतरीन इजाद कहा गया है। एक-दूसरे में खो जाना, प्रेम की तस्दीक में लगे रहना, उन प्रेमियों के हर किस्से में प्रेम होना। ऐसा ही तो प्रेम के बारे में कहा और सुना गया है। लेकिन जब दिल्ली के प्रेम के बारे में बात करते हैं। तो वो प्रेम अलग ही होता है। लड़की अच्छी लगी, तो अपने स्वैग से आई लव यू बोल दिया। बात बनी तो मौजा ही मौजा नहीं बनी तो फिर दूसरी आयेगी न। ऐसा ही है दिल्ली और यहां आने वाले लोग



दिल्ली के बारे में और यहां के निखठ्ठेपन के बारे में बताती है दिल्ली दरबार। दिल्ली में कभी इंग्लैंड के राजा का दरबार लगा था और इस बार दरबार लगाने का काम किया है, सत्य व्यास ने। सत्य व्यास ने अब दिल्ली को लिखा है और इसके पहले बनारस के बारे में।
अगर न जोहरा-जबीनों के दरमियाँ गुजरे
तो फिर ये कैसे कटे जिंदगी, कहाँ गुजरे।

जिगर मुरादाबादी के इस दो पंक्ति से शुरू होता है सत्य व्यास का दिल्ली दरबार।

किताब का जैसा नाम है दिल्ली दरबार यानि कि कहानी दिल्ली के इर्द-गिर्द घूमती है। इसमें दिल्ली को ज्यादा कशिश से नहीं दिखाया है लेकिन दिल्ली के लोगों के बारे में, उनके कामों के बारे में और यह कि दिल्ली, दिल्ली वालों का तो कतई नहीं है। इस किताब में जैसे ही दिल्ली शुरू होता है उसके बाद दिल्ली खत्म ही नहीं होता है। कभी दिल्ली अस्पताल में होता है तो कभी वह दिल्ली मेट्रो में पहुंच जाता है। कभी वह दो प्रेमियों के बिस्तर पर होता है तो दो दोस्तों की गालियों में भी होता है दिल्ली। दिल्ली के कसीदे में कुछ बातें कसी हैं- सत्य व्यास ने।
छोटे शहर के छोटे सपनों को विस्तार देते शहर का उनवान है, दिल्ली। खानाबदोशों के मजमे का मैदान है, दिल्ली। यहां खानाबदोश कई शक्लों में आते हैं। मजदूर, मजबूर, खरीददार और सबसे ज्यादा बेरोजगार। हम यहां एक अलग ही नस्ल के खानादोश थे जो यहीं ठौर जमाने की सोचकर आते हैं। ऐसे खानाबदोश स्टूडेंट्स कहलाते हैं। स्टूडेंट्स, जो बेहतर जिंदगी की तलाश में अपना शहर छोड़ते तो हैं; मगर फिर कभी अपने शहर लौट ही नहीं पाते। यह शहर, दिल्ली खुद चाहे जितनी भी दफा पामाल हुई हो, खानाबदोशों का स्वागत खुले दिल से ही करती रही है।

दिल्ली दरबार के बारे में

दिल्ली दरबार, एक प्रेम पुजारी की कहानी है। एक लापारवाह इश्किए की कहानी है जो अपना हर काम इश्क में करता और जुगाड़ में लगा ही रहता। उसके इश्किए को दो ही काम थे एक प्रेम करना और दूसरा हर समस्या का शाॅटकर्ट निकाल लेना। दिल्ली दरबार एक मनोरंजन टेक्नो जैसी कहानी है जिसमें पहले प्यार होता, फिर टूटता और जिम्मेदार प्यार हो जाता। बस दिल्ली दरबार में सिर्फ वही और वही है। इनके अलावा भी कई लोग हैं जो बस उस इश्किए की कहानी पूरी करने के लिए बने हैं।

किताब का कुछ अंश

उस रोज दो घटनाएं हुई थीं। दिन में मुहल्ले वालों ने शुक्ला जी के टीवी पर रामायण देखा था और रात में महाभारत हो गया था। दिन में सीता जी अपनी कुटिया से गायब हुईं थीं और रात में गीता जी (शुक्ला जी की बेटी) अपनी खटिया से। सीता जी जब गायब हुईं तो रावण के पुष्पक विमान पर नजर आईं। गीता जी जब गायब हुईं तो पुजारी जी के मचान पर नजर आईं। रावण ने सीताहरण में बल प्रयोग किया था। पुजारी जी के बेटे देवदत्त मिश्रा ने गीतावरण में लव प्रयोग किया था। सीता जी को पुष्पक विमान पर जटायु ने देखा था और उन्हें बचाने की भरपूर कोशिश की थी। गीताजी को पुजारी के मचान पर जटाशंकर चाचा ने देख लिया था और बात फैलाने की भरपूर कोशिश की थी। (बात फैलाने में कोई कोताही नहीं की)

खैर, वो वक्त कुछ दूसरा था। नादानों के कन्यादान में देर नहीं की जाती थी और अफवाह उड़ने से पहले विवाह की खबर उड़ा दी जाती थी। पकड़ुआ लव अक्सर अरेंज मैरेज में तब्दील कर दिया जाता था। सो, पुजारी जी और शुक्ला जी ने भी मिल कर देवदत्त और गीता जी का विवाह करा दिया और जैसा कि होना था, राहुल मिश्रा पैदा हुए।
राहुल मिश्रा कौन? जी, राहुल मिश्रा वह जिनकी यह कहानी है।
कहते हैं कि बच्चे के भविष्य में उसके जन्म के साल के ग्रह-नक्षत्रों का बहुत योगदान होता है। राहुल मिश्रा जिस साल पैदा हुए उस साल फिल्मी दुनिया में प्यार, हमारी दुनिया में तकरार और आभासी दुनिया में ऑप्टिकल फाइबर के तार तेजी से फैल रहे थे। जाहिर था कि इसका असर राहुल मिश्रा पर भी पड़ना था। पड़ा भी।
खैर, इधर राहुल मिश्रा पैदा हुए और उधर राहुल के पिताजी की नौकरी की डाक आई थी। देवदत्त मिश्रा को गांव-घर छोड़ कर टाटानगर आने का सरकारी फरमान जारी हुआ था। वो आखिरी दिन था जिस दिन राहुल मिश्रा के पिता खुश हुए थे। क्योंकि उसके बाद तो।
राहुल मिश्रा धरती पर आ चुके थे।

कहानी

कहानी उस दौर की है जब तकनीक इंसान से ज्यादा स्मार्ट होकर उसकी हथेलियों में आनी शुरू हो गई थी। नई तकनीकों ने नई तरकीबों को जन्म देना शुरू ही किया था। यह पूरी किताब राहुल मिश्रा पर रचित है। कहानी शुरू होती है टा से टानगर से और फिर पहुंच जाते हैं दिल्ली। जहां हर दिन, हर रात, हर पल कांड होते ही रहते। इसमें उनके साथी होते झाड़ी यानि कि मोहित मिश्रा। मोहित मिश्रा जो इस किताब के नैरेटर हैं। किताब में झाड़ी पढ़ाकू टाईप का है और राहुल मिश्रा वहीं है। एक बिहारी सब पर भारी। राहुल मिश्रा और झाड़ी दिल्ली में आते तो हैं पढ़ने लेकिन उन्हें घर में ही एक और पढ़ाई मिल जाती है, परिधि। फिर क्या था पढ़ाई गई तेल लेने। राहुल मिश्रा खेलते रासलीला और झाड़ी कमरे के बाहर पहरा देते। परिधि यानि कि मकान मालिक बटुक शर्मा की बेटी। जो कंजूस तो था, लेकिन अपनी इज्जत के लिए कुछ भी कर सकता था और उसी इज्जत के डर ने उनकी आखिर लुटाई हो जाती है।
राहुल मिश्रा को परिधि के बाद नई लड़की मिली, लेकिन दोनों के काम निकलने के बाद एक खतरनाक रीजन से ब्रेकअप भी हो गया। लेकिन फिर कहानी में राहुल मिश्रा के साथ ऐसा कुछ होता है कि वे मजाकिया और लफाड़े राहुल मिश्रा से एक जिम्मेदार राहुल मिश्रा बन जाते हैं जो सिर्फ और सिर्फ परिधि को अपना बनाना चाहते हैं। लेकिन समस्या यह आती है कि राहुल मिश्रा अपने जोश भरे अंदाज में बटुक शर्मा यानि ससुर का पूरा मोबाईल वही इंग्लिश वाली वीडियो से भी देते हैं।

खतरनाक कारनामा

राहुल मिश्रा के कमरे में एक छोटू भी था जो हर रोज खाना बनाने आता था। जिसको राहुल मिश्रा हर रोज डांट-पटकता था। राहुल मिश्रा ने एक शाॅटकर्ट निकाला था अपने मालिक के किराये से बचने के लिये। लकिन आलसी राहुल मिश्रा ने अपने आलस में कुछ काम छोटू को दे दिये। ये समझकर कि पागल है। लेकिन एक दिन बटुक मिश्रा के अकाउंट से लाखों रूपये का चूरन लग जाता है। तब राहुल मिश्रा को पता लगता है कि काट गया है हम सबका छोटू।

अंत भला सो सब भला

राहुल मिश्रा ने पढ़ाई तो कभी की नहीं थी, लेकिन जुगाड़ बहुत की थी। अब जो अपने माई लव को पाने के लिये बटुक शर्मा का दिल जीतना जरूरी था और वो सिर्फ जीत सकते थे, नौकरी से। फिर क्या था पुरानी डार्लिंग के जासूसी में मिल गई नौकरी। रिस्क था, लेकिन राहुल मिश्रा ऐसा गुल्ल खिलाये कि नौकरी मे सबसे ऊपर थे राहुल मिश्रा। इसके बाद तो वही बात हो गई कि मिश्राजी जिम्मेदार आशिक तो बन गये, लेकिन शाॅटकर्ट लगाना कभी नहीं छोड़े।

किताब की खूबी

इस किताब में सत्य व्यास ने हर बार की तरह अपने ढंग में लिखा है दोस्ताना भरे अंदाज में। आप दिल्ली के हो य न हों लेकिन अगर आपके पास राहुल मिश्रा जैसा जुगाड़ू और झाड़ी जैसा हरदम तैयार दोस्त है तो समझ लो कि यह कहानी तुम्हारी है। इसके लेखन में तो गजब का जादू है जो प्रेमियों के बीच, जिसमें खोने का मन करता है, हंसने का मन करता है। कुल मिलाकर हम जैसों को तो पढ़कर मजा आया। किताब के किरदार काल्पनिक हो सकते हैं लेकिन उनकी बातें बढ़ी शायराना सी हैं।

किताब की कमी

कहते हैं कि पहली चीज हरदम अच्छी होती है और दूसरी थोड़ी कमजोर। ऐसा ही कुछ दिल्ली दरबार में मुझे लगा। ऐसा इसलिए क्योंकि मैंने सत्य व्यास की बनारस टाॅकीज पढ़ी है। दिल्ली दरबार पूरी तरह से एक किरदार में घूमती रहती है जो इतना रोचकता नहीं दे पाता है। ये कहानी एक फिल्म की तरह है जिसमें हीरो है, लव है, साजिश है और अंत मे सब बढिया है। कलम में थोड़ी कमी सी लगी मुझे। जो दिल्ली के न होकर दिल्ली के प्रेमी हैं, बस वही तो है ‘दिल्ली दरबार’।
दिल्ली दरबार में दिल्ली है, प्रेम है, जुगाड़ है, गुदगुदाने वाले थोड़े सीन भी हैं और मजाकिये लहजे वाला प्यार है जो बाद में एक जिम्मेदार बनाकर उभरता है। बस यही कुछ हुआ है इस दिल्ली दरबार में।
नाम- दिल्ली दरबार
लेखक- सत्य व्यास
प्रकाशक- हिंदी युग्म

‘‘यार कुछ ऐसी ही मेरी भी कहानी है, बस थोड़ा इधर का उधर है।’’- बनारस टाकीज़

कहते हैं कि किताबें हमारी सबसे अच्छी दोस्त होती हैं और अगर किताब कोई ऐसी मिल जाये जिसको पढ़कर लगे ‘‘यार कुछ ऐसी ही मेरी भी कहानी है, बस थोड़ा इधर का उधर है।’’ तो वही सुकून मिलता है जो एक प्यासे को पानी पीने के बाद मिलता है और शिकारी को अपना शिकार मिलने के बाद, जो खुशी होती है। बस वही खुशी मुझे ‘बनारस टाॅकीज’ को पढ़कर हुई।


हर घटना के पीछे कोई कारण होता है। संभव है कि यह घटित होते वक्त आपको न दिखे; जब यह सामने आएगा, आप सन्न रह जायेंगे।- ज़िग ज़िग्लर

इस वाक्य के साथ शुरू होती है सत्य व्यास की बहुचर्चित किताब ‘बनारस टाॅकीज’।

इस किताब के शीर्षक से ही पता चलता है कि यह किताब बनारस के ऊपर है। इसमें लेखक ने सिर्फ बनारस को लिखा ही नहीं है, बल्कि बनारस की मिठास को घोल दिया है। जो भी इसको पढ़ेगा, उसको पक्का बनारस से प्यार हो जायेगा। इस किताब में बनारस की वो ठेठ बोली भी है और जहां बनारस है वहां महादेव न हो, ऐसा हो नहीं सकता। यहां सबके दिल में महादेव और मुंह में उनका प्रसाद है। यहां लंका गेट भी और अस्सी घाट भी है।

अस्सी घाट। दक्षिण से उत्तर की ओर जाते हुए पहला घाट। वरूणा और अस्सी नदियों के संगम का घाट। संतों का घाट, चंटों का घाट। कवियों का घाट, छवियों का घाट। गंजेड़ियों का घाट, भँगेड़ियों का घाट। मेरा घाट, दादा का घाट। हमारा घाट।

बनारस टाॅकीज के बारे में


बनारस टाॅकीज बनारस यूनिवर्सिटी के भगवानदास होस्टल में रहने वाले भविष्य के वकीलों, मजिस्ट्रेट और जजों की कहानी है। वैसे तो इसमें बहुत से किरदार हैं। लेकिन किताब के पहले पन्ने पर बता दिया जाता है कि यह मुख्यतः तीन दोस्तों पर गढ़ी हुई कहानी है। जिसमें एक सूरज बाबा हैं, अनुराग डे हैं और जयवर्धने हैं। इनके अलावा रोशन हैं, नवेंदु जी हैं, दूबे जी हैं और शिखा है जिसकी प्रेम कहानी भी इसमें गढ़ी है। इनका परिचय सत्य व्यास बड़े रोचकता से देते हैं।

“रूम नंबर -73 में जाइए और जाकर पूछिये की भगवान दास कौन थे? जवाब मिलेगा ‘घंटा’! ये हैं जयवर्धन शर्मा जो बिहार से हैं। लेक्चर, घंटा! लेक्चरर, घंटा! भगवान, घंटा! गलत कहते हैं कहनेवाले की दुनिया किसी त्रिशूल पर टिकी है। यह दरअसल, जयवर्धन शर्मा की ‘घंटे’ पर टिकी हैय और वो खुद अपनी कहावतों पर टीके हैं। हर बात पर एक कहावत कहते हैं। उनकी कुछ कहावते, जैसे- ‘गई मांगने पूत को, खो गई भतार!’
‘बुड़बक की यारी और भादो में उजियारी!’
‘खुरपी के वियाह में, सुप का गीत!’
‘आन्हर गुरु बहिर चेला, मांगे गुड़ ता दे दे ढेला!’

ये कहावते खासकर यूपी-बिहार में खूब प्रचलित है और सत्य व्यास ने इनका बिलकुल सही जगह पर उचित अर्थ के साथ उपयोग किया है। इसके अलावे लोकल बोली का भी इस्तेमाल किया गया है जो इस किताब को एक अलग ही रूप देता है। और बनारस का रंग भर देती है।

ये तो थी जयवर्धन की बात। पर सभी दोस्त कुछ इसी तरह के थे। अनुराग डे दृ क्रिकेट प्रेमी और बातें भी क्रिकेट के स्टाइल में करते हैं! ‘अरे साल, का लेक्चर है जैसे की गार्नर का बाउंसर!’ कुछ इस तरह। इनके रूम पार्टनर हैं- सूरज ‘बाबा’। सूरज को गल्र्स हॉस्टल में कुछ ज्यादा ही इंटरेस्ट है। इनकी माने तो।  ‘A B C D E F G का मतलब-। A boy can do every thing for girls.’

पूरी किताब उन तीनों के तीन साल के फेस तक चलती है। उनका हर एक किस्सा भगवानदास हाॅस्टल से ही जुड़ा होता है। वे रैगिंग से लेकर प्यार, मस्ती, खिचाई, टीचर की डाॅट खाना ये सब उन सबके साथ होता है। लेकिन पूरी किताब में कहानी कहीं भी कमजोर नहीं पड़ती है। इस किताब में लेखक की शैली की दादा देनी होगी कि उसने कहानी को इस प्रकार लिखा है कि आप एक बार शुरू हो जायें। तो बस लगे कि पढते जाओ। इसमें तीनों किरदारों का समान रूप से इंसाफ किया गया है। तीनों की बोलने की शैली अलग और उसी को पढ़कर कोई हंसे बिना नहीं रूक सकता।

एक साजिश


किताब को हम पढ़ते जाते हैं और घुलते जाते हैं। हमारे मन में हंसी के न जाने कितने ठहाके लग गये होते हैं। लेकिन जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते जाते हैं। तब एक ऐसा चैप्टर भी आता है। जो सारी घटनाओं को जोड़ देता है। जैसा कि किताब के पहले पन्ने पर लेखक ने लिखा है ‘‘हर घटना के पीछे कोई न कोई कारण होता है।’’ शुरू में न मैंने उसको सीरियस लिया था और न ही कोई लेगा। लेकिन जब अंत में इसके पन्ने खुलेंगे तब आपको वह कथन जरूर याद आयेगा। भगवानदास  हाॅस्टल में एक ऐसी साजिश होती है जो उनकी जिंदगी में भूचाल ला देता है और बनारस को भी हिला देती है। बस इस किताब में यही एक ऐसी चीज है जो आपके अंदर गंभीरता और घबराहट पैदा करेगी।

एक प्रेम कहानी भी है!


भारत के हर काॅलेज में प्रेम कहानी होती है। उसी तरह इसमें भी एक प्रेम कहानी है। जिसमें शुरूआत नाराजगी, तकरार और लड़ाई होती है। यह प्रेम कहानी होती है सूरज बाबा और शिखा की। लेकिन रांझणा का वो डाॅयलाग याद है न ‘‘ये बनारस है और लौंडा साला यहां भी हार गया तो जीतेगा कहाँ’’। बस वो बात यहां भी लागू होती है। पहले दोस्ती और फिर हो जाता प्यार का खुमार। फिर मुंह गालियों की जगह शायरियां और गजलें बरसने लगती। ऐसी ही इनकी लव स्टोरी है। लंका गेट से काॅलेज में साथ ही होते है। साथ में लंका गेट जाते और अस्सी घाट भी। अंत में इनकी कहानी भी सुखद ही जाती है।

किताब की खूबी


किताब की खूबी यह है कि इसमें लेखक की लेखनी बड़ी दमदार है। वो हमें अंत तक बांधी रखता है। उसके शब्द आसान लेकिन मजेदार होते हैं। उसको पढ़कर ऐसे लगता है कि जब वह सब  हो रहा था तब वह साथ ही लिख भी रहा था। जो हाॅस्टल में पढ़े हैं , उनको यह किताब बहुत पसंद आयेगी। उनको लगेगा जैसे कि वे खुद को पढ़ रहे हैं। कहानी को पढ़कर लगता नहीं है कि इसमें कोई भी चीज काल्पनिक है। हर स्थान वास्तविक है और हर किरदार अपने में जी रहा है।

इस किताब में मेरा कहीं भी फ्लो नहीं टूटा। यही बताता है कि इसमें कमी नहीं है। जो लोग हाॅस्टल वाली लाइफ नहीं जिये हैं, शायद उनको यह किताब पढ़कर अच्छी न लगे। लेकिन अगर उन्होंने भी अपने दोस्तों से जय-वीरू वाली दोस्ती की है तो उनको भी इसमें कोई कमी नहीं मिलेगी।

दोस्तों वाली, मस्ती वाली, हाॅस्टल लाइफ वाली, एक प्रेम कहानी, बनारस से प्यार करने सिखाने वाली किताब है ‘बनारस टाॅकीज’। शुरूआत गुदगुदाने से शुरू होती है और अंजाम थोड़ा गंभीर हो जाता है। एक पढ़ने और हमेशा के लिए याद रखने वाली किताब है ‘बनारस टाॅकीज’।

नाम- बनारस टॉकीजलेखक- सत्य व्यासप्रकाशक- हिन्दी युग्म।

चौरासीः उस सन्नाटे भरी रात में उस शहर से प्रेम और विश्वास छिटक गया

हर शहर की एक अपनी कहानी होती है, हर शहर कुछ कहता है। लोग उनको किस्सों में याद रखें या न रखें पर शहर अपनी कहता रहेगा। कभी वो कहानी प्यार की होगी तो कभी कोई तारीख होगी जिसे शहर याद करता रहेगा। सत्य व्यास की ‘चौरासी’ एक शहर की कहानी है जिसमें दो प्रेमियों की जुगलबंदी है, मनाना-रूठना है और स्वच्छंद प्यार है।


चौरासी से याद आता है 1984। जब एक घटना ने पूरे देश को तोड़ दिया था। उसी चौरासी के प्रभाव में स्टील प्लांट शहर बोकारो भी आ जाता है। इस किताब में  उसी बोकारो ने अपनी कहानी खुद बताई है जिसमें प्यार से लेकर वो क्रूरता, निर्दयता है। जिसके ख्याल से आप खिन्न हो उठेंगे। चौरासी, वो साल जिसने एक अपने ने, दूसरे अपने का विश्वास खो दिया था।

सत्य व्यास मूल रूप से बलिया उत्तर प्र्देश के रहने वाले हैं। आज की पीढ़ी के सबसे पढ़े जाने वाले लेखकों में से एक। सत्य व्यास अपनी पहली किताब ‘बनारस टाॅकीज’ से ही चर्चा में आ गये थे। दिल्ली दरबार के बाद, चौरासी उनकी कलम से निकली तीसरी किताब है। उनकी लेखनी में गजब का जादू है जो पाठक में एक जुड़ाव बनाये रखती है। चौरासी में पहली बार उन्होंने उस मजाकिया और भदेस अंदाज को छोड़ा है। जो बनारस टाॅकीज और दिल्ली दरबार में दिखा था।

चौरासी 


शहर है बोकारो। दौर है चौरासी का। उसी शहर में ऋषि पंजाबी किराएदार के यहां रहता है। उनकी लड़की भी है, मनु। लड़का जो पूरे शहर पर तो रौब जमाता है लेकिन लड़की के सामने फुस्स हो जाता है। मनु, ऋषि की ऐसी गलती पकड़ लेती है। जिस पर वह कुछ भी करवा सकती है। अगले दिन से ऋषि हर रोज मनु के घर जाता और ट्यूशन पढ़ाने की हाजिरी लगाता।

कहानी चौरासी  की है लेकिन घूमती ऋषि और मनु के बीच ही है। एक और किरदार होता है मकान मालिक छावड़ा, जो मनु के पिता भी हैं। ऋषि और मनु के बीच रोज का मिलना और ख्याल रखना, उनके बीच एक नये एहसास के बीज बो देता है।

वो एहसास प्रेम में बदल जाता है और प्रेम शरारतों में बदल जाता है। दुनिया से छुपकर प्रेम की सारी कलाएं दोनों बिखरते हैं। कभी कबूतर उड़ाने के बहाने तो कभी छठ की पूजा के बहाने। दोनों की गलबगियों के बीच स्वर्ण मंदिर पर हमले की खबरें आती रहती हैं। जिससे छावड़ा जी तो परेशान हो जाते हैं लेकिन वो प्रेमी-जोड़े नहीं जिन्हें दुनिया से मतलब ही नहीं था। वो तो अपने प्यार में घुल-मिल रहे थे। उसके बाद किताब का पन्ना पलटता है जिसमें अखबार की एक खबर लगी होती है और तारीख दर्ज होती है, 31 अक्टूबर 1984।

कहानी में मोड़ आता है और जो एक रात लेकर आता है। बस वो रात हिंदुओं और सिखों को अलग कर देती है। एक भीड़ जो सिखों को नोच-खा रही थी, जो अचानक से निर्दयी हो गई थी। उनके हाथों में हथियार नहीं था लेकिन एक शैतान था जो बदला लेने की बात कर रहे थे। वो सड़कों पर निकल आये, घरों में घुसने लगे और लोगों को जलाने-मारने लगे और उसकी शुरूआत हुई गुरनामे से। वो बोकारो शहर खून से लाल होने लगा जो सुबह तक हंस रहा था।


कहानी अपनी निर्ममता पर आ जाती है और एक प्रेमी को मजबूर होकर भीड़ में शामिल कर देती है। ऋषि को अपने परिवार को बचाना था। उसका परिवार मनु थी। उस प्यार के लिए वो उन दंगई में शामिल हो गया। वो रात भर घूमता रहा एक राॅड लेकर जिसने अपने सामने ही कितने को ही जलते देखा। वो लंबी रात जब खत्म हुई थी तो काफी कुछ बदल चुका था। उसके बाद बोकारो न मनु का रहा और न ऋषि का।

प्रेम और भीड़ की क्रूरता के बाद कहानी का तीसरा और आखिरी पड़ाव भी है। मनु और ऋषि के बिछड़ने का और फिर उसके गम में रोने का। पाने के लिए भरसक कोशिश करना और बदनाम होना। आखिर में एक झोंका आता है। जो मनु और ऋषि को कहीं दूर ले जाता है।

किताब की खूबी


किताब की सबसे बड़ी खूबी है इसकी कहानी। जब आप प्रेम के पड़ाव में होंगे तो आप दर-दर मुस्कुराएंगे लेकिन फिर वो रात का दौर आता है जिसे पढ़कर मन खिन्न-खिन्न होने लगता है, कुलबुलाहट होने लगती है और मन कह रहा होता है ‘जल्दी सुबह हो जा’। इसके अलावा शब्द और वाक्य बड़े मजेदार हैं, कुछ तो प्रेम के डायलाॅग हैं। किताब में बार-बार बताया जाता है प्रेम से सीखना।

कुछ अंश ‘चौरासी’ से


साले गद्दार! राज करेंगे! सुन बे! पगड़ी खोल साले की। चीखते हुए तीसरे ने सुक्खा की पगड़ी खोलनी शुरू कर दी। सुक्खा में प्रतिरोध करने की शक्ति भी नहीं बची थी। उसने सुक्खा की पगड़ी उसक गले में ही बांध दी और दूसरा सिरा बस के पीछे बांधकर चला दी। दस फर्लांग चलने के बाद बस पीपल के पेड़ से टकराकर रूक गई। सुक्खा मर गया। वह घिसनटने के पहले मरा या बाद में मरा; यह जानने में किसी की भी दिलचस्पी नहीं थी। न ही फायदा। फायदा बटुए में था जिसका नुकसान हो चुका था।

सत्य व्यास की ये किताब लेखनी और कहानी में अव्वल है। ‘बनारस टाॅकीज’ और ‘दिल्ली दरबार’ अलग विषय की कहानी थी। जिसमें प्यार और दोस्ती थी। उसको अलग तरीके से लिखा गया था लेकिन ‘चौरासी’ एक अलग कहानी है। ये उस दौर के प्रेम की, डर की और सन्नाटे की कहानी है जो एक रात में पसर गया था। लेखक ने उस समय के हालात से हमें रूबरू कराया। लेखक की ये कहानी पहले प्रेम से रौनक लाती है और फिर क्रूरता से कुलबुलाहट करने की कोशिश करते हैं। कहानी का अंत ऐसा है कि पढ़ने वाला आगे के बारे में अंदाजा लगाएगा। मानो लेखक ने पाठक पर छोड़ दिया हो जो अच्छा लगे वो रख लो।

बुक- चौरासीलेखक- सत्य व्यासप्रकाशन- हिंद युग्म।