Tuesday, 4 August 2020

दूर दुर्गम दुरुस्तः पूर्वोत्तर के लिए बनी धारणाओं को तोड़ने की कोशिश करती है ये किताब

पूर्वोत्तर को लेकर उत्तर भारत के लोगों में एक भ्रम बना हुआ है। हम हिमाचल और उत्तराखंड तो बड़े आराम से चले जाते हैं लेकिन पूर्वोत्तर जाने के लिए कई बार सोचते हैं। पूर्वोत्तर के लोगों के साथ दिल्ली में खराब व्यवहार किया जाता है। ऐसे में ये भी डर बना रहता है कि हमारे साथ भी वहां भी वैसा भी हो सकता है। आप सोचते हैं कि पूर्वोत्तर खतरे से भरी जगह है। अगर आपको नहीं पता कि वहां के लोग कैसे हैं तो इन सवालों के जवाब और धारणाओं को तोड़ती है, दूर दुर्गम दुरुस्त।


दूर दुर्गम दुरुस्त पूर्वोत्तर के तीन राज्यों के कुछ जगहों का यात्रा वृतांत है। ये इतनी बखूबी से लिखा गया है कि ऐसा लगता है हम भी यात्रा कर रहे हैं। यात्रा करना भी सुकून देता है और उसके बारे में पढ़ने पर भी। वैसा ही सुकून देती है ये किताब। मुझे ये किताब बहुत अच्छी लगी। इतनी अच्छी कि मैं इसे एक बार मे पढ़कर खत्म कर सकता था लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया। किताब को आराम-आराम से पढ़ा ताकि उसका आनंद कुछ ज्यादा देर तक ले सकूं। जो भी इस किताब को पढ़ेगा उसके साथ भी ऐसा जरूर होगा। 

लेखक के बारे में


इस किताब को लिखा है, उमेश पंत ने। उमेश पंत उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के छोटे-से कस्बे गंगोलीहाट के रहने वाले हैं। अभी वो दिल्ली में रहते हैं। उमेश ने दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के एमआरसी से मास कम्यूनिकेशन में मास्टर्स किया है। करियर की शुरूआत मुंबई में बालाजी टेलीफिल्म्स में बतौर एसोशिएट राइटर की। बाद में नीलेश मिसरा के शो यादों के एडिट बाॅक्स के लिए कहानियां भी लिखीं। ग्रामीण अखबार गांव कनेक्शन में पत्रकार भी रहे। इसके अलावा हिन्दी के तमाम अखबारों में यात्राओं और अन्य विषयों पर लेख लिखते रहते हैं। यात्राकार नाम से खुद का ब्लाॅग चलाते हैं। दूर दुर्गम दुरुस्त उमेश पंत की दूसरी किताब है। उनकी पहली किताब है, इनरलाइन पास। जिसको पाठकों ने काफी पसंद किया था। 

किताब के बारे में


दूर दुर्गम दुरुस्त मेघालय, अरूणाचल प्रदेश और असम की कुछ जगहों का यात्रा वृतांत है। इस यात्रा को लेखक ने दो अलग-अलग समय पर किया। लेखक ने लिखा तो अपनी यात्रा के बारे में है लेकिन जिस तरह लिखा है वो काबिले तारीफ है। शब्दों की ताकत लेखक बहुत अच्छे से समझता है। उन्होंने इसे बिल्कुल कहानी की तरह सुनाया है। पढ़ते हुए लगता है कि हम कोई सिनेमा देख रहे हैं। बात फिर वो हार्निबल फेस्टिवल की हो या पानी में तैरते हुए आइलैंड की। पढ़ते हुए किताब आपको अपना बना लेगी।

किताब की शुरूआत होती है ट्रेन यात्रा से। ट्रेन यात्रा में जो कुछ भी होता है लेखक बताते चले जाते हैं। ट्रेन में जो वो देखते हैं, जो वो करते हैं, यहां तक कि लोगों की बातचीत भी। अक्सर ऐसा होता है कि लेखक अपनी किताब गालियां नहीं रखना चाहता। मगर लेखक ने ऐसा बड़ी बेबाकी से किया है। जिसके लिए उनकी तारीफ भी होनी चाहिए। लेखक शहर, गांव, छोटी-बड़ी जगहों पर घूमता ही रहता है। इस किताब को पढ़कर कई बार लगता है कि पूर्वोत्तर भी जाना चाहिए। किताब की अच्छी बात ये भी है कि लेखक जहां जाता है उस जगह के बारे में अच्छे से बताते हैं, वहां का इतिहास, वहां को भौगोलिकता के बारे में जरूर बताते हैं। जो किताब को और रोचक बनाता है।


किताब सिर्फ जगहों के बारे में बात नहीं करती है। वहां के लोगों के बारे में, परंपराओं के बारे में भी बात करती है। किताब को पढ़कर समझ आता है कि पूर्वोत्तर के लिए हमारे मन में गलत धारणा बनी हुई है। लेखक बताते हैं कि पूर्वोत्तर के लोग भी उतने ही अच्छे हैं जितना कि यहां की जगहें। कई मामलों में पूर्वोत्तर बाकी राज्यों से बेहतर है। यहां महिलाएं रात में आराम से घूमती हैं जबकि बाकी जगहों पर ऐसा करना लड़कियों और महिलाओं के लिए खतरा माना जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि यहां के लोग अच्छे है। इसके अलावा किताब में कई जगह लेखक स्वच्छता का जिक्र करते हैं। तभी तो एशिया का स्वच्छ गांव पूर्वोत्तर में ही है।

ये किताब उन लोगों के लिए दस्तावेज की तरह है जो पूर्वोत्तर जाना चाहते हैं। किताब में बहुत-सी ऐसी जगहें हैं जिनके बारे में आपने न सुना हो तो इस किताब को पढ़ने के बाद आप वहां जा सकते हैं। पूर्वोत्तर में कितना खतरा है ये किताब उसका भी जिक्र करती है। इसके अलावा लेखक बीच-बीच में कुछ ऐसी चीजें बताते हैं जिनको नोट करने का मन करता है। यात्रा, असफला, जीवन, अजनबी और डर जैसे विषयों पर वो ऐसी बातें बताते हैं। जिनको पढ़कर किताब में रोचकता बनी रहती है। इस किताब को पढ़ने के बाद खुशी होती है कि कुछ बेहतरीन पढ़ा है। उससे भी बढ़कर ये ऐसी जगह के बारे में पता चला, जहां के बारे में हमें बहुत कम पता है।

अदना-सा अंश


इन तमाम ख्यालों के बाद जैसे दिमाग में एक अजीब-सी हलचल हुई। एक सवाल कौंधा कि आखिर क्यों हूं मैं इस यात्रा पर। इस तरह से अकेले निकल आने का क्या मतलब है? एक अजीब किस्म का अकेलापन महसूस होने लगा मुझे। यात्राओं के दौरान ऐसा शायद ही पहले कभी हुआ हो मेरे साथ। एक असन्तोष सा था ये, जो न जाने कहां से उपजा था? अंग्रेजी में लंबी यात्राओं के बीच जेहन आने वाली इन भावनाओं के लिए एक टर्म है- मिड टिप क्राइसिस।

खूबी


किताब की सबसे बड़ी खूबी है कि पूर्वोत्तर। पूर्वोत्तर पर बहुत कम किताबें आई हैं ऐसे में ये किताब बहुत अहम हो जाती है। इसके अलावा भाषा बेहद सरल और सहज है। लिखने की शैली भी लाजवाब है, बिल्कुल कहानी की तरह। 220 पन्ने की ये किताब पढ़ते हुए एक बार भी बोर नहीं होंगे। किताब में एक जगह पर कई पेजों पर सिर्फ फोटो हैं। जिनको देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है पूर्वोत्तर कितना खूबसूरत है। इसके अलावा किताब पूर्वोत्तर का एक दस्तावेज जैसा ही है। जो पूर्वाेत्तर जाना चाहता है, जानना चाहते है ये किताब उनके लिए ही है। 


इस किताब के बाद अब पूर्वोत्तर अनजाना नहीं रहा। अगर आप घुमक्कड़ हैं या यात्रा वृतांत पढ़ना पसंद करते हैं तब तो आपको दूर दुर्गम दुरुस्त पसंद आएगी ही। अगर आपको ऐसा करना पसंद नहीं है तब भी आपको ये किताब पढ़नी चाहिए क्योंकि पूर्वोत्तर के बारे में हमारी जो बेवजह और बेकार धारणाएं हैं उनको तोड़ने का काम करती है ये किताब। पूर्वोत्तर असल में कैसा उसकी ही किताब है दूर दुर्गम दुरस्त। 

किताब-दूर दुर्गम दुरुस्त
लेखक- उमेश पंत
प्रकाशन- सार्थक(राजकमल प्रकाशन का उपक्रम)
लागत- 250 रुपए।

Friday, 24 July 2020

एवरेस्ट की बेटीः उस महिला की कहानी जिसने लाचारी नहीं, साहस चुना

सबसे मुश्किल क्या है? मुझे अब तक लगता था कि दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर पहुंचना सबसे कठिन है। मगर अब लगता है सबसे मुश्किल है खुद को बचाए रखना। पता नहीं कौन कब आपकी जिंदगी को ही पलटकर रख दे? लेकिन तमाम मुश्किलों के बावजूद जिंदगी खत्म नहीं होती। सबके हिस्से में कुछ न कुछ आता है बस जरूरत है तो साहस की। उसी साहस की मूरत हैं अरुणिमा सिन्हा। उसी साहस को अरुणिमा सिन्हा ने एक किताब के रूप में रखा है। किताब का नाम है, एवरेस्ट की बेटी।


आज अरुणिमा सिन्हा से कौन वाकिफ नहीं है। वो दुनिया की पहली दिव्यांग महिला हैं जो दुनिया भर की सात सबसे ऊंची चोटियों को फतह कर चुकी है। मगर मैंने जो किताब पढ़ी है वो कहानी उस अरुणिमा की है जो बस नौकरी चाहती थी और उसे मिला कुछ और। एक हादसे ने अरूणिमा की जिंदगी बदल दी। इस किताब में अरूणिमा के हादसे से लेकर माउंट एवरेस्ट के फतह करने तक की कहानी है। इस किताब को पढ़कर हर किसी के अंदर कुछ कर गुजरने का साहस जरूर आएगा।

कहानी


किताब के शीर्षक से लग सकता है कि ये किसी महिला की माउंट एवरेस्ट की कहानी या यात्रा वृतांत है। मगर ये कहानी है एक आम महिला की जो एक नौकरी के लिए एक रेल यात्रा करती है। कुछ चोर उसके गले में पड़ी सोने की चेन छीनना चाहते हैं। मगर जब वो लड़की इसके लिए लड़ने लगती है तो उसे ट्रेन से फेंक दिया जाता है। उसके पैर के ऊपर से ट्रेन गुजर जाती है। सर्दी की ठिठुरन भरी रात में वो मदद के लिए चिल्लाती है मगर उसकी आवाज कोई नहीं सुन पाता। अगली सुबह उसे कुछ लोग देखते हैं इसके बाद उसे अस्पताल में भर्ती किया जाता है। जहां उसे अपना एक पैर खोना पड़ता है। उस पैर की जगह उसे कृत्रिम पैर मिलता है। जब सबको लगता है वो लाचारी भरी जिंदगी जिएगी। तब वो एक निश्चय करती है। दुनिया की सबसे कठिन और ऊंची चोटी को फतह करने की। सबको लगता है वो पागल है। मगर वो लड़की इसके लिए बछेन्द्री पाल से मिलती है, ट्रेनिंग लेती है और फिर उसी कृत्रिम पैर से माउंट एवरेस्ट फतह करती है। मगर ये कहानी बस इतनी-सी है? नहीं।

किताब के दो पेज।

अरूणिमा सिन्हा की ये किताब सिर्फ ये नहीं बताती कि उनके साथ हादसा कैसे हुआ? वो माउंट एवरेस्ट तक कितनी मुश्किलों से पहुंची। इन सबके अलावा माउंट एवरेस्ट की बेटी किताब बताती है इस समाज की दरिंदगी और स्वार्थी रूप। जब ट्रेन में उसके साथ छीना-छपटी की जा रही थी वो डिब्बा लोगों से भरा हुआ था। मगर कोई भी अरूणिमा सिन्हा को बचाने के लिए नहीं आया। ये किताब बताती है कि जब आप सबसे बुरे दर्द से गुजर रहे हों। तब भी अपने को बचाने और जिंदा रखने की कोशिश करती रहनी चाहिए। किताब बार-बार पुरूष समाज पर चोट करती है। वो बताती हैं कि अब भी इस देश में लड़का और लड़की को बराबर नहीं देखा जाता। अरूणिमा सिन्हा किताब में एक जगह बताती है, प्राथमिक कक्षाओं की पुस्तकें ऐसे वर्णनों से पटी पड़ी हैं कि राम पाठशाला जाता है और लक्ष्मी पाठशाला में काम करती है। ऐसी ही बहुत सारी बातें इस समाज के बारे में, अपने बारे में अरूणिमा सिन्हा किताब में बताती हैं।

किताब का एक हिस्सा हादसे से लेकर सही होने तक है। जिसमे अस्पताल, मीडिया और राजनेता भी हैं। अच्छी बात ये हैं कि ये तीनों अरूणिमा सिन्हा के लिए अच्छे ही साबित हुए हैं। एक हिस्सा अरूणिमा सिन्हा का माउंट एवरेस्ट तक चढ़ने का है। जिसमें उनकी ट्रेनिंग के बारे में भी है। जो उन्होंने उत्तराखंड के उत्तरकाशी में ली थी। उनको उस समय कैसी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था? इसके बाद माउंट एवरेस्ट कैसे चढ़ीं और सबसे मुश्किल कहां पर आई? ये सब किताब में है। एक प्रकार से ये किताब यात्रा वृतांत भी है जो माउंट एवरेस्ट के बारे में अच्छी जानकारी देता है। अरूणिमा सिन्हा के साहस की कहानी है जो हर किसी को पढ़नी चाहिए।

किताब की खूबी


किताब कई मायनों में बहुत अच्छी है। पहले तो ये एक ऐसे महिला के बारे में है जो सबके लिए एक प्रेरणा हैं। उसके बाद ये लिखी इस तरह गई है कि रोचकता बनी रहती है। 150 पेज की ये किताब कहीं भी बोरियत नहीं करती। अगर पढ़ते-पढ़ते रूक भी जाते हैं तो दिमाग में वही सब चलता रहता है जो वापस किताब की ओर खींच ले जाता है। भाषा बेहद सरल और सहज है। वैसे ये किताब इंग्लिश में बोर्न अगेन ऑन द् माउंटैन के नाम से है। मगर मैंने इसको हिन्दी में पढ़ा है। आप अपनी सहूलियत के हिसाब से इसे पढ़ सकते हैं।


एवरेस्ट की बेटी किताब एक साहसी महिला की कहानी है। इसे पढ़ें ताकि आप उस हादसे के बारे में जान सकें। आप जान सकें कि एक हादसा किसी की जिंदगी को किस प्रकार बदल सकता है। आप इस किताब को पढ़ें ताकि आपको पता चल सके कि हालात चाहे जैसे हों। अगर आपके पास एक लक्ष्य है तो वो लक्ष्य आपको लाचार नहीं होने देगा। वैसे तो अरूणिमा सिन्हा ने किताब में बहुत कुछ कहा है मगर मुझे एक बात बहुत पसंद है।

यदि आपको रोना है तो ऐसा आप अकेले में करें। दुनिया एक विजेता को देखना चाहती है। हारे और टूटे लोगों की हंसी उड़ाई जाती है।

किताब- एवरेस्ट की बेटी
लेखक- अरूणिमा सिन्हा
प्रकाशन- प्रभात पैपरबैक्स
कीमत- 150 रुपए।

Tuesday, 21 July 2020

सिर्फ जौन एलिया की शेरो शायरी के लिए नहीं उनको जानने के लिए पढें ये किताब

जो गुजारी न जा सकी हमसे, हमने वो जिंदगी गुजारी है।

इन रूहानी पंक्तियों को लिखने वाले का नाम है जौन एलिया। आज इस नाम से कौन वाकिफ नहीं है?लोग इस शायर के दीवाने हैं। सोशल मीडिया पर इस शख्स की वीडियो लोग बार-बार देखते हैं। कभी ये शायर शायरी पढ़ते-पढ़ते रोने लगता है तो कभी शायरी सुनने वाले रोने लगते हैं। हर कोई जौन को उनकी शायरी से जानता है, उनकी गजलों और नज्मों से जानता है। मगर उनकी जिंदगी कैसी थी? बिल्कुल साधारण या कठिनाईयों से भरी। वे असली जिंदगी में कैसे थे? खुशमिजाज या फिर शायरी ही उनका अक्स है। जौन एलिया के इन्हीं सारे पहलुओं पर एक किताब आई है, जौन एलिया एक अजब गजब शायर।


नौजवान हों या बुजुर्ग जौन एलिया को सब पसंद करते हैं। उनका सोचने का और कहने का ढंग ही कुछ अलग है। लेखक ने उनकी जिंदगी के उन पहलुओं के बारे में बताया है जो शायद आपको और मुझे नहीं पता। ऐसा भी नहीं कि इसमें सिर्फ जौन एलिया के किस्से और जिंदगी के पहलू ही हैं। इन सबके अलावा किताब में जौन की लिखी शायरी, नज्में, गजलें और कायनात भी हैं। अगर आपको जौन एलिया के बारे में जानना है उनकी चुनिंदा शायरी, नज्में और गजलों को पढ़ना है तो ये किताब आपको पढ़ लेनी चाहिए।

लेखक के बारे में

मुन्तजिर फिरोजाबादी 

इस किताब को लिखा है मुन्तजिर फिरोजाबादी ने। उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद से ताल्लुक रखने वाले मुन्तजिर फिरोजाबादी का असली नाम अनंत भारद्वाज है। उनका परिवार चाहता है कि प्रशासनिक सेवाओं में जाएं लेकिन उनका दिलो-दिमाग साहित्य के अलावा कहीं और लगता ही नहीं है। मुन्तजिर लवली यूनिवर्सिटी जालंधर में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। खुद शायरी करते हैं और कवि-सम्मेलनों में भी शिरकत करते हैं। जौन साहब को बहुत मानते हैं मुन्तजिर। उनकी सुबह जौन साहब के शेर से होती है। अक्सर जौन उनकी तबियत और शायरी दोनों में आ जाते हैं। इनसे अगर आप मिलना चाहते हैं तो सबसे अच्छी जगह है फेसबुक।

किताब के बारे में


जौन एलिया एक अजब गजब शायर किताब जौन एलिया की जिंदगी पर है। जौन एलिया भारत में उत्तर प्रदेश के अमरोहा में पैदा हुए। 1947 में भारत आजाद तो हुआ लेकिन उसके दो हिस्से हुए। जौन एलिया का पूरा परिवार पाकिस्तान चला गया लेकिन जौन नहीं गए। 1956 तक जौन अमरोहा मे रहे। 1956 में जौन को अपने फैमिली के पास कराची जाना पड़ा। इस किताब में जौन के एक पहले इश्क के बारे में, उनकी पहली शायरी के बारे में, उनकी पहली किताब के बारे में बहुत सारे किस्से दिए गए हैं। वो अमरोहा में क्या किया करते थे? कराची जाने के बाद भी जौन एलिया अमरोहा को नहीं भूल पाए। वो अमरोहा में बहने वाली बान नदी को कितना याद करते थे?

किताब में बहुत सारे शायर और लोग जौन एलिया के बारे में, उनके किस्से बताते हैं। वो आस्तिक थे या नहीं? इस बारे में भी किताब में बताया गया है। जौन एलिया को समाज के दायरे में रहना पसंद नहीं था? इस बारे में एक जबरदस्त किस्सा है। उनकी बीमारी, परेशानी सबके बारे में बहुत सारे किस्से दिए गए हैं। जो आप पढ़ेंगे तो समझ आएगा कि जौन एलिया क्या हैं? जो अपने खून थूकने पर शायरी लिख दे वो कुछ भी कर सकता है किताब के किस्सों को पढ़ने के बाद समझ आता है कि जौन एलिया जैसा कोई नहीं। उन्होंने जो जिया वही लिखा। कहते हैं शायर जो कहता है वो शायद उसकी जिंदगी में कुछ होता नहीं है। मगर जौन एलिया की शायरी में ऐसा नहीं है। उनके बारे में कहा जाता है कि वे आज जिंदा होते तो उनका कत्ल कर दिया जाता।


किस्से तो जौन एलिया की जिंदगी के हैं जिनको पढ़ने पर जौन एलिया समझमें आते हैं। मगर पूरी किताब में सिर्फ यही नहीं है। इसमें कुछ फर्नूद हैं। मैंने जब ये नाम पढ़ा तो मुझे नहीं समझ आया क्या है? गूगल किया तो वहां भी कुछ नहीं मिला। इसमें कुछ विषयों पर जौन एलिया के विचार थे तो मुझे लग रहा है कि फर्नूद का मतलब राय है। इसमें मुशायरा, चंद सवाल, रोग, जुर्म, नफरत और नकल जैसे विषयों पर जौन एलिया की राय है। जिसे पढ़ने के बाद समझ आएगा कि जौन क्या सोचते थे? उनके दिमाग में क्या चलता था? इन सबको पढ़ने के बाद तो आप जौन को सिर्फ उनके शायरी के लिए पसंद नहीं करेंग। इसके अलावा आगे तो आपको अपनी और जौर एलिया की फेवरेट चीज मिलेंगी, गजलें और नज्में।

किताब की खूबी


किताब की सबसे बड़ी खूबी तो यही है कि वो जौन एलिया पर लिखी गई है। उसके बाद किस्से बेहतरीन हैं। चाहे वो 8 साल की उम्र में पहले इश्क का हो या दुबई एयरपोर्ट पर हाथ में लहराते शराब की बोतल का हो। इसके अलावा भाषा सरल और सहज तो है लेकिन थोड़ी कठिन भी है। इसमें उर्दू के शब्द बहुत सारे हैं। कई तो ऐसे शब्द हैं जिनका मतलब भी नहीं पता। एक प्रकार से ये अच्छा ही है क्योंकि इससे आपकी उर्दू अच्छी हो सकती है। जिनको उर्दू आती है उनको इसकी भाषा बिल्कुल सरल लगेगी।


फिरोज मुन्तजिर की ये किताब पढ़ी जाए जौन एलिया के बारे में जानने के लिए। इस किताब को पढ़ना चाहिए शायरी को जानने के लिए। इस किताब को पढ़ना चाहिए जौन एलिया की नज्मों और गजलों के लिए। इस किताब को तो आपकी शेल्फ में होना चाहिए। जब कभी परेशान हों, मूड खराब हो तो इस किताब को उठाइए और पढ़ना शुरू कीजिए जौन की गजलें। यकीन मानिए सुकून मिलेगा।

अब नहीं कोई बात खतरे की, अब सभी को सभी से खतरा है।

किताब- जौन एलिया एक अजब गजब शायर
लेखक- मुन्तजिर फिरोजाबादी
प्रकाशन- हिन्दी युग्म
कीमत- 150 रुपए।

Tuesday, 7 July 2020

अंदर तक छू जाती है ‘भोपाल सहर...बस सुबह तक‘ की कहानी

बारिश के बाद का सूरज कितना और किस हद तक चुभ सकता है, इसको सिर्फ वो ही महसूस कर सकता है। जो भीगकर सूरज की तल्खी के मुकाबिल बिना छत के खड़ा हो।

ये कुछ लाइनें हैं एक किताब की। किताब जिसकी कहानी बहुत जोरदार है। वो अच्छी है क्योंकि उस कहानी को लिखा बेहतरीन तरीके से है। लेखक ने किताब में एक हादसे की जमीन पर एक मार्मिक कहानी बुनी है। जब उस कहानी को पढ़ते हैं तो उस कहानी में हम भी बंध जाते हैं और सोचने लगते हैं कि आगे क्या होगा? भोपाल सहर...बस सुबह तक किताब बहुत हद तक जिंदगी के फलसफे को बताती है। जिंदगी जो कई पहलुओं में होती है, सपने, खुशी, चाहत और मजबूरी। ये सब आपको इस किताब में बहुत हद तक गहरे तक ले जाते हैं।


लेखक के बारे में 


लेखक।
इस किताब को लिखा है आजाद ने। सुधीर लेखक के अलावा एक फिल्मकार, गीतकार और अच्छे वक्ता हैं। मध्य प्रदेश के अमरबाड़ा के रहने वाले सुधीर बुनियादी तौर पर एक संजीदा शायर हैं। जिंदगी के पहलुओं को बेहतरीन तरीके से पन्नों पर उतारते हैं सुधीर। इस किताब को लोगों ने पसंद किया है। ये किताब अंग्रेजी में भी अनुवादित होकर छप चुकी है। हाल ही में उनकी शाॅर्ट फिल्म ‘द लास्ट वुड’ की खूब प्रशंसा हुई। फिलहाल आजाद अपनी अगली किताब लिव-इन को लिखने में व्यस्त हैं।

कहानी


तो कहानी शुरू होती है पुराने भोपाल के आखिरी घर से। जहां एक औरत अपनी तीन लड़कियों के साथ रहती है। आबिदा जिसके शौहर की हादसे में मौत हो गई थी। उसकी तीन बेटियां नसरीन, शमीन और सहर को हालात ने वक्त से पहले बड़ा कर दिया था। आबिदा घर से ही सिलाई का काम करती थी और उसी से उनकी रोजी-रोटी चलती थी। मगर ये काम उनका पेट सही से नहीं भर पाता था। हर रोज उनको किसी न किसी मुसीबत का सामना करना पड़ता था।

गरीबी के इस हालात तब बदले जब नसरीन की शादी हो गई। मगर खुशी ज्यादा टिक नहीं पाई पहले नसरीन की मौत फिर शमीन की और सहर को इन हालातों ने कुछ और ही बना दिया। सहर किसी और से प्यार करती थी लेकिन उसे नसरीन के शौहर से निकाह करना पड़ता है। जब फिरोज के करीब आना चाहती है तो फिरोज दूर चला जाता है। आखिर में सहर की मुलाकात उसके प्यार अमन से होती है। अमन उसे दिल्ली ले जाना चाहता है और सहर मान भी जाती है। अब सहर दिल्ली जा पाती है या नहीं? अमन भोपाल आता है या नहीं। अगर आता है तो फिर क्या होता है? इन सबके बारे में जानने के लिए आपको भोपाल सहर...बस सुबह तक किताब को पढ़ना पड़ेगा।

किताब के बारे में


किताब में मार्मिकता कूट-कूट के भरी पड़ी है। जब लगता है सब अच्छा हो रहा है तभी कुछ ऐसा होता कि दुख के बादल छा जाते। किताब में सिर्फ हादसे नहीं है, लेखक ने कुछ सच्ची घटनाओं को भी डाला है। जैसे कि
ट्रेन में फिरोज को हिन्दु-मुसलमान दंगे में मार दिया जाना। ये 1984 के दंगे की थोड़ी-सी झलक दिखाती है। इसके अलावा भोपाल त्रासदी को इस किताब का क्लाइमेक्स है। जब आप क्लाइमेक्स तक आएंगे तो मार्मिकता के सागर में डूब जाएंगे।



किताब में सिर्फ कहानी नहीं चल रही होती है। बीच-बीच में लेखक कुछ ऐसी बातें लिखते हैं जो नोट करने का मन करता है। जो कभी अकेलेपन पर होती है तो कभी खुशी और दुख पर। लेखक की ये बातें किताब को और रोचक बनाती है। किताब में उन चार लोगों के अलावा भी कुछ किरदार हैं जो बाद में आपस में कहीं न कहीं जुड़ जाते हैं। चाहे वो मुख्तार हो, अतहर हो, अमन और विमला सभी किरदार एक-दूसरे से कहीं न कहीं जुड़े हुए है। एक किताब सिर्फ एक कहानी नहीं कहती उस जगह के बारे में बताती है। लेखक ने बखूबी से भोपाल के बारे में काफी कुछ कहा है। चाहे वो ईद में भोपाल का माहौल हो या फिर शाम को झील किनारे का नजारा। ये सब पढ़कर कुछ भोपाल के बारे में कल्पना की जा सकती है।

कहानी शुरू तो होती है आबिदा के परिवार से लेकिन अंत होता है सभी किरदारों के एक हो जाने से। ये कहानी अंदर तक छू जाती है। कहानी में आगे बढ़ने से पहले दिमाग ही कहानी बनने लगता है। लेखक ने इतने अच्छे से लिखा है कि ये अंदर तक असर कर जाती है। अगर आप एक अच्छी कहानी को पढ़ना चाहते हैं तो सुधीर आजाद की भोपाल सहर...बस सुबह तक जरूर पढ़िए।

किताब की खूबी


इस किताब की सबसे बड़ी खूबी इसकी कहानी है और इसे जिस तरह से लिखा है। वो इसको असरदार बनाता है। भाषा सरल है लेकिन शब्दों में उर्दू बहुत है। उर्दू इतनी ज्यादा की हर पंक्ति में उर्दू का कोई न कोई शब्द जरूर मिल जाएगा। आपको उनको मानी नहीं मालूम होंगे लेकिन पढ़ने पर अंदाजा लग जाता है कि क्या कहा जा रहा है? आप इन उर्दू के शब्दों को नोट भी कर सकते हैं जिससे इनके बारे में जाना जा सके। आपको ये किताब पढ़नी चाहिए एक अच्छी कहानी के लिए। मार्मिकता को शब्दों में, कहानी में कैसे पिरोया जाता है आपको ये किताब पढ़कर ही समझ आएगा। 


किताब से कुछ अंश 


कुछ ही देर में टेन के रुकने से लोगों की सांसें रूक गईं। दहशतगर बोगियों में तलवार लेकर चढ़े और अपने मजहब के नारे लगाते हुए लोगों को लहूलुहान करने लगे। वे बिना-देखे जाने लोगों पर तलवारें चलाने लगे। चादर ओढ़कर सो रहे मुख्तार चाचा समेत शर्मा दंपत्ति का कत्ल कर दिया गया। फिरोज ने कुछ मुकाबला किया पर कब तक करता।

भोपाल...सहर से सुबह तक 151 पेजों की एक पतली-सी किताब है जिसे आप एक बैठक में खत्म कर सकते हैं। कहानी में इतनी रोचकता है कि ये आपको उठने ही नहीं देगी। ये कहानी आपको अंदर तक छू जाती है। जीवन के किल्लतों से लेकर खुशियों के सारे पलों को किताब बखूबी दर्ज करता है। चाहे वो किसी का जिंदगी से जाना हो या प्रेम से बिछड़ना हो। जिंदगी के इन फलसफों को बताती ये किताब वाकई अच्छी किताब है।

पुस्तक- भोपाल सहर...बस सुबह तक
लेखक- सुधीर आजाद
प्रकाशन- सर्वत्र
कीमत- 150 रुपए।

Friday, 19 June 2020

गर फिरदौसः ये फिरदौस की कहानी है! फिरदौस यानी कि जन्नत, फिरदौस मतलब कश्मीर

कश्मीर को जन्नत कहा गया है, जिन्होंने देखा उन्होंने माना भी। इसके बावजूद वहां हिंसा का दौर चलता रहता है। न्यूज चैनल और अखबार हमें बता देते हैं कि कश्मीर में क्या हो रहा है? हम हमेशा एक पक्ष की कहानी सुनते आए हैं। अब एक किताब आई गर-फिरदौस। इसमें उस कश्मीर की कहानी है जिसे अभी तक किसी ने नहीं कहा। ये किताब बताती है कि कश्मीर जन्नत है लेकिन वहां के लोग उससे दूर हैं।


ऐसा भी नहीं है गर-फिरदौस में किसी का पक्ष रखा गया है, किसी की बात कही गई है। वो तो बस एक कहानी है जो अपना काम कर रही है। ये कहानी कश्मीरियत के होने की भी है। कुछ सालों में कश्मीर में बहुत कुछ घटा है। लेखिका ने उन्हीं घटनाओं को कहानी के रूप में बताया है। इस किताब को पढ़ने के बाद आप भी कश्मीर के गम में थोड़ा डूबेंगे और सोचने पर मजबूर हो जाएंगे।

लेखिका के बारे में

लेखिका प्रदीपिका सारस्वत।

इस किताब की लेखिका हैं प्रदीपिका सारस्वत। प्रदीपिका पेशे से पत्रकार हैं। मीडिया नौकरी छोड़कर अब वे फ्रीलांस राइटर बन गई हैं। कश्मीर को उन्होंने बहुत करीब से देखा है। वहीं से देश भर को वहां के हालात के बारे में बताती रही हैं। प्रदीपिका वैसे तो आगरा की हैं मगर वे घर पर रहती कम हैं। वे कहती भी हैं कि मैं घुमक्कड़ हूं। जहां होती हूं, वहीं की हो जाती हूं। मास कम्यूनिशेन की पढ़ाई की और डेस्क के पीछे बैठने वाले मीडिया में आ गईं। वहां टिक नहीं पाईं तो नौकरी छोड़ी और कश्मीर चली गईं। वहां कुछ महीने रहीं और फिर सबके सामने किताब लेकर आईं, प्रदीपिका सारस्वत।

किताब के बारे में


गर फिरदौस में एक कहानी है जिसके तीन मुख्य किरदार हैं, इकरा, शौकत और फिरदौस। किताब में इन्हीं के नाम से तीन अलग-अलग चैप्टर हैं। अपने चैप्टर में वे अपनी-अपनी कहानी बताते हैं, अपने-अपने कश्मीर को बताते हैं। इकरा एक काॅलेज में पढ़ने वाली लड़की है जिसे एक लड़का पसंद है। जिसे अपने दोस्तों के साथ रहना पसंद है, जो कुछ देखती है उसे अपने ब्रश से कोरे कागज पर उतारती है। जिसे शाम को डल झील के किनारे घूमना पसंद है। फिरदौस, एक पढ़ा-लिखा नौजवान है जो दिल्ली से पढ़कर आया है। उसने कश्मीर से बाहर के हिन्दुस्तान को देखा है। उसे घुटन महसूस होती है जब वो दोनों जगह अंतर पाता है। तीसरा किरदार है, शौकत। शौकत वो कश्मीरी है जो आतंकवादी और सेना के बीच पिस रहा है। वही डर उसके अंदर बना रहता है।

कहानी कुछ ऐसे शुरू होती है कि फिरदौस और इकरा अपने कुछ दोस्तों के साथ श्रीनगर जाते हैं। रास्ते में सेना फिरदौस को पकड़ ले जाती है और उसके बाद कहानी कश्मीर को बताती है। कभी इकरा के कश्मीर को दिखाया जाता है जिसे न कोई सही लगता है और न ही कुछ गलत। उस घटना के बाद फिरदौस की जिंदगी पूरी तरह से बदल जाती है। उसे अपनी पढ़ाई बेमानी लगने लगती है। शौकत कहानी में थोड़ी देर से आता है मगर बहुत जरूरी बातें बताता है। उसी के माध्यम से लेखिका कश्मीर में आतंकवाद और सेना को लेकर आती है। मुजाहिदीन क्या सोचते हैं? सेना इनका क्या करती है? ये सब किताब में पढ़ने को मिलता है।

गर फिरदौस सिर्फ कहानी नहीं है कि पढ़ा जाए और भूला दिया जाए। ये तो कश्मीर की कहानी है, वहां के लोगों की कहानी है। इसमें बताया गया है कि कोई कश्मीरी हथियार उठाता है तो क्यों उठाता है? किताब में बहुत अच्छी तरह से बताया गया है कि कश्मीर के लोग क्यों सेना से डरते हैं? किताब में एक जगह जिक्र भी है जब फिरदौस सोचता है कि बदन पर वर्दी और हाथों में बंदूक लिए लोग सबके लिए आम नहीं थे। डर और मौत के साये सिर्फ उसके ही मुल्क के हिस्से आए थे। ये एक ही देश के दो जगहों के बारे में बताता है। इसके अलावा पाकिस्तान से आने वाले लोगों के बारे में भी काफी कुछ कहा गया है। शौकत के किरदार इस कश्मीर से रूबरू कराता है। इसी के बारे में एक जगह शौकत सोचता है, परदेसी मुल्क में कोई आखिर क्यों अपना सब कुछ छोड़कर जान हथेली पर लिए इस तरह फिरेगा। जब ये सब पढ़ते हैं तो लगता है अब तक कश्मीर के बारे में कुछ और ही सुनते आए थे।


किताब में इसके अलावा कश्मीर की सुंदरता का खूब जिक्र है। इसमें सुंदरता के नाम पर सिर्फ डल झील, श्रीनगर और शिकारा नहीं है। इसके अलावा कश्मीरी पकवानों के बारे में भी बीच-बीच में जिक्र होता रहता है। उर्दू शब्द तो इतने ज्यादा हैं कि आपको हर लाइन में उर्दू शब्द मिल जाएंगे। किताब में सब बुरा ही बुरा नहीं है। गर फिरदौस बताती है कि कश्मीर बंद होने के बावजूद उनकी जिंदगी बंद नहीं हुई थी। इंटरनेट बंद होने के बाद भी उन्होंने लोगों से बात करना बंद नहीं किया था। हर वीकेंड पर साथ बैठकर दावत करना फिर भी नहीं भूले थे। कर्फ्यू के बीच भी प्रेमी, प्यार करना नहीं छोड़े थे। गर फिरदौस, उस कश्मीर की कहानी है जिसके बारे में कोई नहीं बताता। जहां जिंदगी तो सरपट से दौड़ रही है लेकिन बेबसी और चुभन भी है।

किताब की खूबी


गर फिरदौस की सबसे बड़ी खूबी तो उसकी कहानी का ढंग है। जिसमें सिर्फ कहानी नहीं, कश्मीर को भी कह दिया है। उसके बाद भाषा बहुत सरल है। उर्दू के बहुत शब्द हैं लेकिन इतने भी कठिन नहीं कि समझ में न आएं। पूरी किताब में सिर्फ तीन तस्वीरें हैं, जो आपको तीनों चैप्टर में मिल जाएंगी। शायद लेखिका ने उसे कश्मी में रहते हुए कैद किया होगा। कमियां तो आपको इसमे ढूढ़ने से भी नहीं मिलेंगी। हो सकता आपको लगे कि ये काल्पनिक भी हो सकता है। फिर भी नहीं भूलना चाहिए कि लेखिका एक पत्रकार हैं। ये कश्मीर का रिपोर्ताज है बस उन्होंने इसे कहा कहानी के ढंग में है। क्योंकिा घटनाएं भुला दी जाती हैं लेकिन किस्से और कहानी जेहन में बने रहते हैं। इस किताब को पढ़ने के बाद शौकत, इकरा और फिरदौस भी आपके जेहन में बना रहेगा।

गर फिरदौस डिजिटल संस्करण में है। इसे आप किंडल पर जाकर पढ़ सकते हैं। बहुत ज्यादा मोटी भी नहीं हो तो आप एक बैठक में ही इसे पढ़ डालेंगे। गर फिरदौस जैसी किताबें दिमाग को सोचने पर मजबूर करती हैं। मेरा विश्वास है कि किताब खत्म होने के बाद भी आप कश्मीर के बारे में सोचते रहेंगे। जिसके बाद शायद आप कश्मीर को कुछ अलग नजर से देखेंगे। किताब पढ़ने के बाद मुझे फिरदौस की एक बात याद रहती है, जो कश्मीर के लोगों की कहानी भी है। 

रोज मुर्दे की तरह जीने से एक दिन सचमुच का मर जाना बेहतर है। 

किताब- गर फिरदौस।
लेखिका- प्रदीपिका सारस्वत
प्रकाशन- एमेजाॅन किंडल।
कीमत- 29 रुपए।

Wednesday, 17 June 2020

इंडिया ऑफ्टर गांधीः आजादी के बाद के कुछ सालों की कहानी, जिसमें बहुत कुछ बना और बहुत कुछ बिगड़ा!

जैसे ही आखिरी ब्रिटिश सिपाही बंबई या कराची बंदरगाह से रवाना होगा। हिन्दुस्तान परस्पर विरोधी धार्मिक और नस्लीय समूहों के लोगों की लड़ाई का अखाड़ा बन जाएगा। 
                                      - जे. ई. वेल्डन, 1915।

इंडिया ऑफ्टर गांधी जिसका हिंदी अनुवाद भारत गांधी के बाद है। आजादी के बाद के भारत के इतिहास को बेहतरीन तरीके से बताया है। ऐसा लगता है कि हम किसी किताब की अलग-अलग कहानी पढ़ रहे हैं जो घूम-फिरके एक ही किरदार पर आकर ठहर जाती है, जवाहर लाल नेहरू। 1947 में नेहरू कैसे थे और 1964 में आते-आते क्या थे? इस किताब को पढ़ने के बाद समझ आता है। ये किताब दुनिया के विशालतम लोकतंत्र का सिर्फ इतिहास नहीं है। ये किताब आज की सरकार और राजनेताओं के लिए एक सबक भी है। उन्हें इस किताब से सीखना चाहिए कि जब संकट आए, समस्याएं आएं तो क्या नहीं करना है? हमारे सामने उस समय कुछ समस्याएं थीं, हमने तब क्या किया और क्या नहीं करना चाहिए था? दोनों ही बातें बताती है ये किताब।

लेखक के बारे में


रामचन्द्र गुहा।

रामचन्द्र गुहा देश के जाने-माने इतिहासकार हैं। वे देश के बड़े मुद्दों पर अपनी राय रखते हैं और लोग उनको सुनते हैं। उनका जन्म 1958 में देहरादून में हुआ। दिल्ली और कलकत्ता से पढ़ाई की। कई जगह प्रोफेसर भी रहे। दस साल तीन महाद्वीपों में पांच अकादमिक पदों पर रहने के बाद वे अब पूरी तरह से लेखक बन चुके हैं। उनकी लिखी किताबों को 20 भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। इस किताब के अलावा भारत नेहरू के बाद भी काफी चर्चित रही है। रामचन्द्र गुहा ने बैंगलोर को अपना ठिकाना बना लिया है। अब वे वहीं से लेखन का काम करते हैं।

क्या है किताब में


किताब में आजादी के समय से लेकर नेहरू के निधन तक ही कहानी है। उस दौरान जो भी बड़े और जरूरी मुद्दे, घटनाएं हुईं। वो सब इस किताब में है। किताब शुरू होती है एक प्रस्तावना से जिसकी कुछ पंक्तियों के बाद गालिब का एक शेर आता है। फिर हिन्दुस्तान के बारे में काफी कुछ बताया जाता है। जिसमें लेखक के खुद के विचार है। वो भारत को अस्वाभाविक राष्ट्र कहते हैं, इस प्रस्तावना में वे इसकी वजह भी बताते हैं। उसके बाद शुरू होती है किताब।

इंडिया आॅफ्टर गांधी में पहला चैप्टर है आजादी और  
राष्ट्रपिता की हत्या। आजादी के समय देश का क्या माहौल था? देश के आंदोलनकारी जो अब नेता बन चुके थे, वे क्या कर रहे थे? गांधी जी देश के अलग-अलग हिस्सों में जाकर शांति बहाल करने की कोशिश में लगे थे। आजादी मिली और उसके बाद देश की सबसे बड़ी त्रासदी हुई। जिसमें लाखों लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा, देश में हिंसा का माहौल था। उस दौर को लेखक ने आंकड़ों, बयान, संस्मरण से बताने की कोशिश की है। इसके अलावा किताब में विभाजन, 565 रियासतों को एक करना, कश्मीर समस्या, शरणार्थी, कुछ विकास की घटनाएं, आदिवासी समस्या, राज्यों का पुनर्गठन और चीन से युद्ध के बारे में विस्तार से बताया है।

किताब में 17 चैप्टर हैं। हर अध्याय में देश की एक कहानी है, एक समस्या है और उन पर लिए कुछ कदम हैं। जो पढ़ते हुए कभी सही लगता है तो कभी लगता है ये नहीं होना चाहिए। फिर चाहे केरल सरकार को बर्खास्त करना हो या आंध्र प्रदेश के शख्स का अनशन करते हुए मर जाना हो या फिर बात हो नेहरू का हमेशा वी के मेनन के पीछे खड़ा रहना हो। जिसका नतीजा निकला भारत का 1962 में चीन से पराजय का मुंह देखना पड़ा। देश के कई राज्य उसी 17 सालों में बने। वो कैसे बने? क्या समस्याएं आई? बंबई महाराष्ट्र का हो, गुजरात में जाए या अलग ही रहे? ये सब जानकारी ये किताब देती है।

हर चैप्टर की शुरूआत में ऐसे ही कथन हैं।

ये किताब कुल मिलाकर हमें जागरूक करती है। हमें वो सब जानकारी देती है। जिनके बारे में या तो बहुत कम पता है या पता ही नहीं है। मुझे नहीं पता था कि जवाहर लाल नेहरू ने अपने खास दोस्त शेख अब्दुल्ला को गिरफ्तार करवाया। मुझे नहीं पता था जब नेहरू की मौत हुई तो शेख फूट-फूटकर रो रहे थे। मुझे नहीं पता था कि चीन और भारत के बीच क्या बातें हुईं थी? ये किताब संविधान में बने कुछ प्रमुख कानूनों की भी बात करता है। जिनको लेकर संविधान सभा में बहुत बहस हुई। चाहे भाषा का मामला हो, अल्पसंख्यकों के अधिकार का मामला हो या झंडे पर विचार की बात हो। संविधान सभा के स्वरूप और उस समय दिए गए बहुत सारे कथनों को भी किताब में डाला गया है।

रामचन्द्र गुहा ने ये किताब बहुत रिसर्च के बाद लिखी है। जो पढ़ते हुए समझ में भी आता है। उन्होंने इसके लिए कितनी मेहनत की है, ये किताब के आखिर में संदर्भ देखने के बाद समझ आता है। 525 पेज की इस किताब के आखिरी 47 पेज में सिर्फ संदर्भ हैं। लेखक ने हर चैप्टर के अलग-अलग संदर्भ लिखे हैं। जो इस किताब को और भी विश्वसीन बनाता है। आप इस किताब को पढ़ने के बाद सिर्फ उस दौर के इतिहास, परिस्थितियों और घटनाओं को ही नहीं समझते। आपको समझ आता है भारत, आप खोज पाते हैं भारत। भारत को जानने और समझने के लिए एक मुकम्मल किताब है, भारत गांधी के बाद।

क्यों पढ़ें?


वैसे तो मुझे ये बताना नहीं चाहिए क्योंकि अब तक बहुत सारे लोग इसको पढ़ चुके हैं। इस किताब को कई अवाॅर्ड भी मिल चुके हैं। आउटलुक ने तो इसे बुक आॅफ द् ईयर से नवाजा है। फिर भी मुझे ये अच्छी लगी क्योंकि इसमें जानकारी बहुत है, वो भी रोचक तरीके से। पढ़ते हुए मैं कभी बोर नहीं हुआ। आगे पढ़ने की लालियत बनी ही रहती थी। ये किताब लेखक ने अंग्रेजी में लिखी। इसका हिन्दी अनुवाद सुशांत झा ने किया। मैंने ये किताब हिन्दी में ही पढ़ी। भाषा बिल्कुल सहज और सरल है। आपको पढ़ते हुए दिक्कत नहीं आएगी। लेखक ने किताब में कुछ ऐसे लोगों के बारे में बताया है। जिन्होंने बहुत जरूरी काम किए हैं लेकिन उनके बारे में बहुत कम लोगों को पता है।

किताब में बहुत कम चित्र हैं।

किताब में तस्वीरें बहुत कम हैं। लेखक ने पूरी किताब में तस्वीरें रखने की बजाय, कुछ पेज तस्वीरों के लिए छोड़ दिए हैं। ये तस्वीर उन लोगों की हैं जिनका किताब में जिक्र है। तस्वीरें सिर्फ लोगों की नहीं हैं कुछ घटनाओं की तस्वीरें है। तस्वरों के अलावा कुछ नक्शे भी किताब में दिए हुए हैं। किताब को एक और चीज रोचक बनाती है। हर चैप्टर की शुरूआत में किसी न किसी व्यक्ति का कथन है। जो उस चैप्टर के मुद्दे से संबंधित होता है। भारत गांधी के बाद मुझे काफी कुछ जानने को मिला। ये किताब ज्ञान का एक भंडार है जिसे हर किसी को पढ़ना चाहिए। ये उस दौर की समस्याओं को भी बताता है, हमारी कमियों को भी बताता है और हमने क्या किया वो भी। आखिर में किताब में दिए एक अमेरिकी पत्रकार की टिप्प्पणी, जो कछ हद तक सही है और कुछ हद तक गलत।

हमारे लिए हिन्दुस्तान का सिर्फ दो ही मतलब हैं, अकाल और जवाहर लाल नेहरू।

किताबः इंडिया ऑफ्टर गांधी।
लेखक- रामचन्द्र गुहा।
अनुवादक- सुशांत झा हिन्दी।
प्रकाशक- पेंगुइन बुक्स।
कीमत- 399 रुपए।


Thursday, 11 June 2020

वन लाइनर के अलावा मुसाफिर कैफे में मुसाफिर जैसा कुछ भी नहीं है

असल में किताबें दोस्त तब बनती हैं जब हम सालों बाद उन्हें पहली बार की तरह छूते हैं। किताबें खोलकर अपनी पुरानी अंडरलाइन्स को ढूंढ़-ढूंढ़कर छूने की कोशिश करते हैं। किसी को समझना हो तो उसकी शेल्फ में लगी किताबों को देख लेना चाहिए। किसी की आत्मा समझनी हो तो उन किताबों में लगी अंडरलाइन को पढ़ना चाहिए।

ऐसी गहरी और अच्छी बातें किताब को रोचक बनाती हैं। दिव्य प्रकाश दुबे इस काम को बहुत अच्छी तरह से करते हैं। उनकी हर किताब में ऐसी ही बातें मिल जाती हैं जिनको नोटडाउन करने का मन करता है। आज मैं जिस किताब के बारे में बात कर रहा हूं वो है, मुसाफिर कैफे।

लड़की देखने गए और वहां वो पहले से ही ...

किताब का नाम उसके बारे में काफी कुछ बता देता है। उसी को देखकर हम किताब को पढ़ने या न पढ़ने का मन बनाते हैं। मुसाफिर कैफे को मैंने उसके नाम से ही पसंद किया था। पूरी किताब में मुसाफिर खोजता रहा मगर मिला नहीं। मुसाफिर कैफे में एक कहानी है जो कुछ हद तक लव स्टोरी है और कुछ हद तक आज की जिंदगानी है। मुसाफिर कैफे में लेखक ने बहुत हद तक आज के नौजवानों की रग पकड़ने की कोशिश की है। शायद इसलिए ये किताब युवाओं को पसंद आई है।

लेखक के बारे में 

Divya Prakash Dubey (@divyapdubey) | Twitter                                                             
मुसाफिर कैफे को लिखा है दिव्य प्रकाश दुबे ने। दिव्य प्रकाश चार किताबें लिख चुके हैं। हाल ही में उनकी किताब अक्टूबर जंक्शन आई है। मुसाफिर कैफे उनकी तीसरी किताब है। इसके अलावा उनकी दो किताबें शर्तें लागू और मसाला चाय है। उनकी स्टोरीबाजी और संडे वाली चिट्ठी काफी पापुलर रही है। पढ़ने-लिखने में उन्होंने बीटेक और एमबीए किया है। 2017 में अपनी नौकरी छोड़कर पूरी तरह से लेखक बन चुके हैं। इन दिनों सोशल मीडिया पर लाइव करके लोगों से बात करते हैं। वहां अपना कुछ सुनाते हैं और दूसरों का सुनते भी हैं।


कहानी


ये कहानी है तीन नौजवानों की, सुधा, चंदर और पम्मी की। लेखक ने धर्मवीर भारती के उपन्यास गुनाहों के देवता के तीन मुख्य पात्रों को आज के समय में दिखाने की कोशिश की है। सुधा, चंदर और पम्मी के अपने सपने हैं और अपनी जिंदगी से कुछ अलग चाहते हैं। इसके बावजूद तीनों की जिंदगी एक-दूसरे से जुड़ी रहती है। ये कहानी कोई ट्राइंग्ल लव स्टोरी नहीं है कि कोई किसी को प्यार करता है तो कोई किसी से। सुधा वकील है जो तलाक दिलवाती है। जिससे उसका शादी से विश्वास उठ चुका है इसलिए वो शादी नहीं करना चाहती। चंदर थोड़ा कन्फ्यूज्ड है वो जिंदगी से क्या चाहता है? उसे खुद नहीं पता। पम्मी कहानी में थोड़ा देर से आती है। सुधा और चंदर की मुलाकात मुंबई के एक काॅफी हाउस में होती है। दोनों जल्दी दोस्त बनते हैं और फिर साथ रहने लगते हैं।

साथ रहते हुए चंदर को लगता है कि अब उसे शादी कर लेनी चाहिए जबकि सुधा का मानना है कि हम बिना शादी के भी साथ रह सकते हैं। चंदर मुंबई और सुधा को छोड़कर  निकल पड़ता है एक सफर पर। ये सफर उसे मसूरी पहुंचाता है। यहीं उसकी मुलाकात छोड़कर पम्मी से होती है। दोनों मिलकर मसूरी में ही कैफे खोलते हैं मुसाफिर कैफे। कहानी फिर सीधे दस साल आगे जंप करती है। उसके बाद सुधा और चंदर कैसे मिलते हैं। दोनों शादी करते हैं या नहीं, अगर करते हैं पम्मी का क्या होता है? ये सब जानने के लिए आपको मुसाफिर कैफे पढ़नी होगी।

किताब के बारे में


किताब में कहानी क्या है? उसको शाॅर्ट में बताने की कोशिश की है। किताब को इस प्रकार रोचक तरीके से लिखा गया है कि आप एक बार में पढ़ लेंगे। किसी किताब को अच्छा बनाती है कहानी के बीच की बातचीत। इस किताब में वो बातचीत पढ़ने में तो अच्छी लगती है लेकिन ऐसा बहुत कम होता है। वो सब फसाना-सा लगता है, खासकर सुधा और चंदर की बातचीत। पढ़ते हुए लगता है कि ऐसा सिर्फ मूवीज में हो सकता है वास्तव में नहीं। चाहे फिर वो दोस्त बनने की बात हो या फिर बिना शादी के हनीमून जाने की बात। हो सकता है कि बहुत-से लोगों को ये पसंद आया हो लेकिन ये मुझे किताब की सबसे बड़ी कमी लगी।

                                    मुसाफिर कैफे : दिव्य प्रकाश ने ...

किताब की भाषा बहुत सहज और सरल है। जिसे पढ़ने में आसानी होती है। इसके अलावा बहुत सारे वन लाइनर हैं और बहुत सारी ऐसी बातें हैं जिनको आप अंडरलाइन जरूर करना चाहेंगे। बीच-बीच में अंग्रेजी शब्द और अंग्रेजी भी है मगर वो खटकती नहीं है। इसके अलावा टाइटल भी अनोखे ढंगे से लिखे गए हैं जैसे कि ‘उ से उस दिन की बात’, ‘अ से अंडमान निकोबार’।

लेखक अपनी किताब को बहुत मेहनत से लिखता है। मगर पाठक को कैसी लगेगी? ये उसके हाथ मे नहीं होता है। दिव्य प्रकाश दुबे की अक्टूबर जंक्शन पढ़ने के बाद मुझे मुसाफिर कैफे थोड़ी कम पसंद आई। मुसाफिर कैफे मेरे लिए वो पहली किताब है जिसे मैंने किंडल पर पढ़ा। इसके बावजूद जिन्होंने ये किताब नहीं पढ़ी है उनको पढ़नी चाहिए। मगर ये सोचकर मत पढ़िए कि इसमें यात्रा और मुसाफिर जैसा कुछ होगा। 

सबकी मंजिल भटकना है, कहीं पहुंचना नहीं।

किताब- मुसाफिर कैफे।
लेखक- दिव्य प्रकाश दुबे।
प्रकाशक- हिन्दी युग्म और वेस्टलैंड लिमिटेड।
कीमत- 150 रुपए।
किंडल प्राइस- 115 रुपए।